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गुरूवार, 20 सितंबर 2018

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सवाल मोदी से नहीं, राहुल गांधी से पूछो!

मीडिया का एक बड़ा वर्ग और खुद कांग्रेस पार्टी बड़ी चालाकी से इसे बीजेपी के लिए झटका और राहुल गांधी का उदय बनाने पर तुले हैं।

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20 दिसंबर 2017

नीरज बधवार

 
बीजेपी गुजरात चुनाव जीतकर लगातार छठी बार वहां अपनी सरकार बनाने जा रही है। बावजूद इसके मीडिया का एक बड़ा वर्ग और खुद कांग्रेस पार्टी बड़ी चालाकी से इसे बीजेपी के लिए झटका और राहुल गांधी का उदय बनाने पर तुले हैं। बेशक बीजेपी को उतनी सीटें नहीं मिली जितनी आनी चाहिए थी फिर भी किसी राज्य में लगातार छठी बार सरकार बनाने को आप उस पार्टी के लिए कम से कम झटका तो नहीं बता सकते। ये देखकर हैरानी होती है कि एक और चुनावी हार के लिए राहुल गांधी से सवाल पूछने के बजाए बीजेपी को कुछ सीटें कम मिलने को मुद्दा बनाकर सारी चर्चा को उसके ईर्दगिर्द रखने की कोशिश की जा रही है।

हमें समझना होगा कि बीजेपी के लिए इस बार की स्थितियां पिछले तमाम चुनावों से बिल्कुल अलग और ज़्यादा चुनौतीपूर्ण थी। पहले लोग नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट करते थे इस बार ऐसा नहीं होने वाला था। इसके अलावा 22 सालों की anti-incumbency थी, जीएसटी और नोटबंदी जैसे बड़े-बड़े मुद्दों पर लोगों की कथित नाराज़गी थी, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकोर और हार्दिक पटेल जैसे युवा नेताओं की तिकड़ी थी जो पिछले कई महीनों से जातिगत आंदोलनों के ज़रिए सरकार के खिलाफ माहौल बना रहे थे और पहले से कहीं आक्रमक राहुल गांधी तो थे ही। इस सबके बावजूद अगर बीजेपी एक बार फिर से सरकार बनाने में कामयाब हो जाती है, तो ये उसके लिए झटका कैसे हो गया?

सवाल तो कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए कि इतनी सारी चीज़ें पक्ष में होने के बावजूद वो बीजेपी को सत्ता में आने से रोक क्यूं नहीं पाई? अगर वाकई जीएसटी और नोटबंदी को लेकर लोग नाराज़ थे, पाटीदार बीजेपी से रूठे हुए थे, राज्य सरकार के विकास के दावे झूठे थे, तब भी लोगों ने बीजेपी को तो दोबारा सरकार में लाना मज़ूर किया लेकिन उन्हें ये मज़ूर नहीं था कि एक मौका कांग्रेस को भी दे दिया जाए। अगर इतनी आसान पिच पर भी कांग्रेस बीजेपी को पटखनी नहीं दे पाई, तो जीत के लिए उसे और क्या चाहिए?

ये देखकर बड़ी हैरानी हो रही है कि लगातार छठी बार सत्ता में आने के बावजूद बीजेपी की घटी सीटें तो विश्लेषकों की चिंता का सबब है मगर हिमाचल में सत्ता गंवाने के लिए कांग्रेस से सवाल नहीं पूछा जा रहा। बीजेपी तो 22 सालों की anti incumbency से निपट गई मगर कांग्रेस सरकार तो वहां लगातार दूसरी बार भी नहीं आ पाई।

2014 लोकसभा चुनावों के वक्त देश के 12 राज्यों कांग्रेस की सरकारें थी अब ये संख्या घटकर 5 पर आ गई है वहीं बीजेपी जो 2014 में 5 राज्यों में काबिज़ थी आज सहयोगी दलों को मिलाकर देश के 17 राज्यों में उसकी सरकार है। आज़ादी के बाद बहुत कम मौकों पर किसी एक पार्टी की इतने राज्यों में सरकार रही है। अगर मोदी के पीएम बनने के बाद भी बीजेपी लगातार राज्यों में चुनाव जीतती जा रही है, तो ये केंद्र सरकार और मोदी के प्रति लोगों का विश्वास भी बड़ा कारण है। वहीं केंद्र और बीजेपी शासित राज्यों के प्रति जिस नाराज़गी की बात कांग्रेस करती है अगर वो उसे किसी भी तरह चुनावी नतीजों में तब्दील नहीं कर पा रही, तो इसके लिए कांग्रेस नेतृत्व पर ही सवाल खड़े होने चाहिए।

मगर ये देखकर हैरानी है कि एक के बाद एक चुनावी हार के बाद न तो कांग्रेस के भीतर से राहुल गांधी के प्रति कोई आवाज़ सुनाई पड़ती है और न ही कथित विश्लेषकों की तरफ से इस पर कोई तीखी टिप्पणी की जाती है। उल्टा ये वर्ग न जाने कबसे इस ताक में बैठा है कि कांग्रेस को कहीं कोई चुनावी जीत हासिल करे और इसे राहुल गांधी के करिश्मे से जोड़कर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय नेता घोषित किया जाए।

एक और मुद्दा जिसे कथित विश्लेषकों द्वारा बड़ी चालाकी से इग्नोर किया गया है वो जातिगत राजनीति। ये बात समझ से परे है कि गुजरात में जाति की राजनीति करने वाले हार्दिक और जिग्नेश तो मीडिया के हीरो हैं। उनके बढ़ते कद की बात की जाती है। ये बताया जाता है कि कैसे हार्दिक ने मोदी के दांत खट्टे कर दिए मगर इन नेताओं द्वार की जा रही जातिगत राजनीति पर कभी सवाल उठाए नहीं जाते। अगर साम्प्रदायिक राजनीति के लिए बीजेपी को लताड़ा जाता है, तो खुलेआम जातिगत राजनीति के लिए लालू और हार्दिक को वैसी फटकार क्यूं नहीं लगाई जाती? तब ये क्यूं नहीं कहा जाता कि जाति की बात करके ये लोग समाज को बांट रहे हैं। जबकि हकीकत तो ये है कि जातिगत राजनीति ने हमारे समाज को साम्प्रदायिक राजनीति के मुकाबले कहीं ज्यादा बांटा है। साम्प्रदायिक राजनीति करने वाला (गलत ही सही) अपने स्तर पर लोगों को धर्म के नाम एकजुट होने को कह रहा है लेकिन जातिगत राजनीति करने वाला तो धर्म के भीतर ही लोगों को जाति के नाम पर बांट रहा है।

अंत में यही कहना चाहूंगा कि हारा हुआ इंसान जीवन में आगे कहां जाएगा ये इस बात से तय होता है कि कि हार के बाद वो खुद को कसूरवार मानता है या दूसरों को। अगर हर के बाद आप खुद के अलावा हर चीज़ को कसूरवार मानेंगे, तो परिणाम वैसे ही होंगे जैसे अब तक होते आए हैं। और ये बात कांग्रेस को जितनी जल्दी समझ आ जाए, उतना ही उसके और देश की राजनीति के लिए बेहतर होगा।
 


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