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नया हरियाणा

रविवार, 16 दिसंबर 2018

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काकोरी कांड के शहीदों को शत-शत नमन

अंग्रेजों के खजाने को लूट लेना वह भी चलती रेल से और उसकी सुरक्षा व्यवस्था को तोड़कर कितने साहस, शौर्य, संकल्प और सुनियोजिम रणनीति की जरुरत होगी। वह भी अपना कोई निजी स्वार्थ नहीं।

Kakori Kand, 19 dec, naya haryana, नया हरियाणा

19 दिसंबर 2017

नया हरियाणा

काकोरी कांड : जिसने देश में क्रांतिकारियों के प्रति जनता का नजरिया बदल दिया था। नौ अगस्त 1925 को हुए काकोरी कांड का मुकदमा 10 महीने तक चला था, जिसमें रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह और अशफाक उल्लाह खां को फांसी की सजा हुई।

जंग-ए-आजादी की लड़ाई में 1925 में रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह और अशफाक उल्लाह खां सहित 10 क्रांतिकारियों ने लखनऊ से 14मील दूर काकोरी और आलमनगर के बीच ट्रेन में ले जाने वाले सरकारी खजाने को लूट लिया। इन्होंने दरअसल भारतीयों के खून पसीने की कमाई को अंग्रेजों से छीना था, लूट तो भारत को अंग्रेज रहे थे। यह खाजना इसलिए छीना गया था ताकि आजादी की लड़ाई के लिए हथियार खरीदे जा सकें और अंग्रेजी सेना को हथियारों से टक्कर दी जा सके।

रामप्रसाद बिस्मिल ने ट्रेन के गार्ड को बंदूक की नोंक पर काबू कर लिया। गार्ड के डिब्बे में लोहे की तिज़ोरी को तोड़कर आक्रमणकारी दल चार हज़ार रुपये लेकर फरार हो गए। काकोरी षड्यंत्र मुक़दमें ने काफ़ी लोगों का ध्यान खींचा। इसके कारण देश का राजनीतिक वातावरण आवेशित हो गया।

इस घटना से जुड़े 43 अभियुक्तों पर मुक़दमा चलाया गया। निर्णय 6 अप्रैल, 1927 को सुनाया गया। रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशनसिंह को मृत्युदण्ड की सज़ा सुनाई गई। सचीन्द्र सान्याल को आजीवन कारावास हुआ और मन्मथनाथ गुप्त को 14 वर्षों का सश्रम कारावास दिया गया। कुछ समय बाद अशफाकउल्ला को मृत्युदण्ड दिया गया। 14 अन्य लोगों को लम्बी सज़ा सुनाई गई। दो व्यक्ति अभियोजन पक्ष के मुखबिर बन गए। चन्द्रशेखर आज़ाद को पुलिस खोजती रही।

कल्पना कीजिए, अंग्रेजों के खजाने को लूट लेना वह भी चलती रेल से और उसकी सुरक्षा व्यवस्था को तोड़कर कितने साहस, शौर्य, संकल्प और सुनियोजिम रणनीति की जरुरत होगी। वह भी अपना कोई निजी स्वार्थ नहीं। क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे आजादी के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था की जरूरत के ​थी।

शाहजहाँपुर में हुई बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी थी। इस योजनानुसार दल के ही एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने ​9 ​अगस्त ​1925 ​को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी “आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन” को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद व ​6 अन्य सहयोगियों की मदद से गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया।

पहले तो उसे खोलने की कोशिश की गयी, किन्तु जब वह नहीं खुला तो अशफाक उल्ला खाँ ने अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ा दिया और हथौड़ा लेकर बक्सा तोड़ने में जुट गए।  मन्मथनाथ गुप्त ने उत्सुकतावश माउजर का ट्रैगर दबा दिया जिससे छूटी गोली अहमद अली नाम के मुसाफिर को लग गयी. वह मौके पर ही ढेर हो गया। शीघ्रतावश चाँदी के सिक्कों व नोटों से भरे चमड़े के थैले चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने में एक चादर वहीं छूट गई।

अगले दिन अखबारों के माध्यम से यह खबर पूरे संसार में फैल गयी। ब्रिटिश सरकार ने इस ट्रेन डकैती को गम्भीरता से लिया और सी०आई०डी० इंस्पेक्टर तसद्दुक हुसैन के नेतृत्व में स्कॉटलैण्ड की सबसे तेज तर्रार पुलिस को इसकी जाँच का काम सौंप दिया। अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कुल​40  क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया, जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु-दण्ड की सजा सुनायी गयी। इस मुकदमें में कुछ  क्रान्तिकारियों को काला पानी का दण्ड दिया गया था।


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