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नया हरियाणा

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

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रोहतक नगर निगम चुनाव में हुड्डा ने लगाई अपनी साख दांव पर, पड़ सकता है ये दाव महंगा

अशोक तंवर ने कहा हुड्डा द्वारा तय किए गए मेयर पद के प्रत्याशियों से कांग्रेस पार्टी का कोई लेना देना नहीं है।

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7 दिसंबर 2018

नया हरियाणा

कांग्रेस का चुनाव निशान भले ही हाथ हो परंतु रोहतक के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथ दो तरह से मजबूत माने जाते हैं. पहला रोहतक ( सोनीपत, रोहतक व झज्जर) की जनता और दूसरा कांग्रेस हाईकमान में पकड़. रोहतक की जनता ने उन्हें एमएलए भी बनाकर दिए हैं, वो बात अलग है कि जिस रोहतक के विकास के नाम पर वो खुद का प्रचार प्रसार करते थे, उसी रोहतक की जनता ने उन्हें मात दे दी थी. ऐसे में रोहतक नगर निगम के चुनाव हुड्डा के लिए जीवनदान बन सकते हैं या हाथ कटने की शुरूआत.

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर ने कहा कि भाजपा सरकार ने परिसीमन के नाम पर वोटर लिस्ट में भारी गड़बड़ी की है। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा  कि भाजपा ने नगर निकाय चुनाव में देरी की है। वहीं यमुनानगर में कांग्रेस प्रत्याशियों को चिन्हित करके उनके वार्डों को इस तरह से विभाजित किया है कि पति का वोट एक वॉर्ड में तो पत्नी का वोट दूसरे वॉर्ड में चला गया है। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भी निशाना साधते हुए तंवर ने कहा कि वे नटवरलाल से भी आगे हैं। दिल्ली को तो संभाल नहीं पा रहे हरियाणा में पैर पसारने की कोशिश में लगे हैं।
तंवर ने कहा कि जब आलाकमान पार्टी निशान पर चुनाव न लड़ने का फैसला ले चुकी है तो अपने नाम से प्रत्याशी उतारने का क्या औचित्य है। पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा द्वारा तय किए गए मेयर पद के प्रत्याशियों से कांग्रेस पार्टी का कोई लेना देना नहीं है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि बसपा-इनेलो को हराने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को खुली छूट देनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी में मेयर व पार्षद चुनाव के लिए कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह था। इसके अलावा एक-एक वार्ड पर दर्जनों कार्यकर्ता चुनाव लड़ना चाहते थे। जिसके चलते कांग्रेस कमेटी की बैठक में यह तय हुआ था कि कांग्रेस पार्टी सिंबल पर चुनाव नहीं लड़ेगी। जो अपने आप को कांग्रेस समर्थित बताते हैं उनका पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है। यह पूर्व सीएम का निजी फैसला है।

वरिष्ठ वकील नारायण तेहलान के अनुसार- पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा या तो परिस्थिति को समझ नहीं रहे हैं, या समझना चाह नहीं रहे हैं, या फिर उन्हें उनके सलाहकारों द्वारा दिग्भ्रमित किया जा रहा है। कोई भी हमारे जैसा थोड़ी बहुत सोच समझ रखने वाला आदमी यही कहेगा कि वर्तमान परिस्थितियों में हुड्डा को सीधे-सीधे रोहतक के निकाय चुनाव में हाथ नहीं डालना चाहिए। इतने सस्ते में अपनी साख दांव पर लगाना सियासी तौर पर अक्लमंदी नहीं कही जा सकती, खासतौर पर तब जब पार्टी में उनको लेकर विवाद है, कोर्ट कचहरी के मामले में उलझे हुए हैं तथा खुद कांग्रेसी (स्थानीय भी) उनको नीचा दिखाने के लिए आमादा हैं, विरोधी तो हैं ही।
हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष तंवर का यह बयान कि हुड्डा की तरफ से उतारे गए प्रत्याशी से कांग्रेस पार्टी का कोई लेना देना नहीं है, बहुत कुछ कहता है। इसका मतलब यह है कि प्रथम तो कांग्रेसियों को उस प्रत्याशी का विरोध करने की न केवल छूट होगी, बल्कि पार्टी की ओर से उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा। दूसरे हुड्डा का कैंडिडेट हारता है तो पार्टी की हार नहीं बल्कि हुड्डा की व्यक्तिगत हार मानी जाएगी जिसका प्रभाव उनके कद के लिए विपरीत परिणाम लाने वाला रहेगा। हुड्डा को चाहिए कि आ बैल मुझे मार वाली कहबत को अपने लिए साकार होने देने से बचें और अपना ठप्पा लगे कैंडिडेट को मैदान से हटाकर किसी नेक योग्य आदमी को समर्थन दें।
 


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