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नया हरियाणा

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चौ. मित्रसेन आर्य : कर्त्तव्य पथ से नहीं डिगे

मित्रसेन आर्य ने देश के सफलतम उधोगपतियों में अपना नाम शुमार किया और हर हालातों में जरूरतमंदों के साथ मजबूती से खड़े रहकर ऐसा श्रेष्ठ व अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी बहुत कम मिसाल देखने को मिलती है।

Ch. Mitarsen Arya: Do not Fall Off Duty, naya haryana, नया हरियाणा

15 दिसंबर 2017

ओमकार चौधरी

वारेन बफेट, अजीम प्रेम जी, जार्ज सोरोस, एली ब्राड, चार्ल्स एफ फीने, गार्डन मूर, कार्लोस स्लिम हेलू, सुलेमान बिन अब्दुल, बिल गेट्स और जार्ज कैसर। ये दुनिया के वो दानवीर हैं, जिन्होंने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा अच्छे कार्यों के लिए दान करने का संकल्प लिया हुआ है। जब तब ये मीडिया की सुर्खियां बटोरते रहते हैं, परंतु ऐसे दानवीर भी हैं और हुए हैं, जिन्होंने आजीवन समाज सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य, अध्यात्म, योग और चरित्र निर्माण के क्षेत्रों में लगी ऐसी असंख्य संस्थाओं को मुक्त हाथ से दान दिए हैं परंतु कभी प्रचार में यकीन नहीं किया। हिसार के खांडाखेड़ी में आज ही के दिन 15 दिसंबर 1931 को चौधरी शीशराम के घर जन्म लेने वाले देश के प्रमुख उद्योगपतियों और समाजसेवियों में शुमार चौधरी मित्रसेन आर्य ऐसे ही महात्मा थे, जो अपने सद्कार्यों, विचारों, सिद्धांतों और दानवीरता से समाज के लिए एक बड़ा संदेश छोड़ गए कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच से भी सफलता का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। अभावों और संकटों के बावजूद दूसरों की मदद के लिए हाथ बढ़ाए जा सकते हैं। हर प्रकार के अवरोधों को पार करते हुए ईमानदारी, दृढ़ संकल्प और कड़े परिश्रम व पुरुषार्थ से बुलंदियों पर पहुंचकर समाज और राष्ट्र के हित में पूरे समर्पित भाव से काम किया जा सकता है।
देश दुनिया में ऐसे और भी ऐसे व्यक्तित्व हमें मिल जाएंगे, जिन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में अपना एक विशेष स्थान बनाया, लेकिन ऐसे बहुत कम मिलेंगे, जिन्होने ख्याति से दूर रहकर अपनी पूंजी का एक अहम हिस्सा समाज की भलाई के लिए खर्च किया। चौधरी मित्रसेन ने उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में अपने उधम स्थापित किए और आदिवासी क्षेत्रों में अनेक गुरुकुलों की स्थापना की ताकि गरीब परिवार के बच्चों को वहां निशुल्क शिक्षा, आवास और भोजन आदि उपलब्ध कराया जा सके। ऐसा शायद ही कोई गुरुकुल, कोई आर्य संन्यासी, आर्य विद्वान और उपदेशक रहा होगा, जिसका उन्होंने आर्थिक सहयोग न किया हो। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब उन्होंने अपने साथ काम करने वाले व्यक्ति को मित्र मानते हुए निस्वार्थ भाव से जरूरत पड़ने पर विपत्ति काल में आर्थिक मदद की। योग गुरू स्वामी रामदेव ने अपने लेख में खास तौर से इस बात को रेखांकित किया है कि उनके अनेक योग एवं विज्ञान शिविरों में उनकी उपस्थिति रहती थी। पतंजलि के लगभग सभी समारोहों में वे समर्पित भाव से रहते थे, परंतु मंच पर आने से बचते थे। बहुत अच्छे विचारक थे परंतु समारोहों और कार्यक्रमों में उदबोधन से बचते थे। उनमें प्रचार-प्रसार में रहने की लालसा दूर-दूर तक नहीं थी। ऐसे विरले त्यागी स्वभाव वाले व्यक्तित्व आज के दौर में तलाशना बहुत कठिन है। आज तो हालत यह है कि कोई छोटा-मोटा कार्यक्रम भी करता है तो समाचार-पत्रों में लंबी चौड़ी विज्ञप्ति फोटो सहित भिजवा देता है।
शून्य से शिखर तक की उनकी यात्रा किसी के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। अभावों में जीवन यात्रा शुरू की और कठोर श्रम, समर्पण और अनुशासन के बल पर वह मुकाम हासिल किया, जिसकी कल्पना तो बहुत करते हैं परंतु अक्सर मूर्त रूप नहीं दे पाते। देश के शीषर्स्थ  कारोबारियों में शुमार होने के बावजूद वह बेहद विनम्र बने रहे। उनके होठों पर बाल सुलभ मुस्कान  और बहुत धीमी आवाज में बात करना जैसे उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा बन गए थे। मेरे जैसे हजारों थे, जिन्हें लगता था कि मित्रसेन जी का उन्हें सर्वाधिक स्नेह हासिल है। वह प्रचार-प्रसार से  किस तरह बचते रहते थे, इसका अहसास मुझे 2010-11 में हुआ। हरिभूमि में जानीमानी हस्तियों के साक्षात्कार की श्रृंखला चल रही थी। उनका इंटरव्यू लेने के लिए मुझे काफी प्रयास करने पड़े। उसके कुछ अंश तब प्रकाशित हुए थे। उनसे वह बातचीत एक अमूल्य धरोहर की तरह है, जिसे गाड़ी में अक्सर सुनता हूं। उसी साक्षात्कार में एक प्रश्न के उत्तर में मित्रसेन जी ने कहा था कि मेरे छह बेटे हैं और तीन बेटियां और दामाद हैं। उन्हें सीख देने के लिए मैंने कभी कुछ नहीं कहा। वे मेरे जीवन और आचरण से कुछ ग्रहण करना चाहें तो कर लें। ऐसे में, जबकि माता-पिता और बुजुर्ग आजकल बात-बे-बात बच्चों को रोकते-टोकते और नसीहतें देते रहते हैं, मित्रसेन जी के ये विचार निसंदेह अमूल्य सीख की तरह हैं। वास्तव में उनका संपूर्ण जीवन ही अनुकरणीय है।
जब दस वर्ष के थे, पिता दृष्टिविहीन हो गए। दो चाचा चल बसे। दो बुआ वैधव्य को अभिशप्त हो गई। परिवार की जिम्मेदारी कंधों पर आई तो नियमित स्कूली शिक्षा छूट गई। मित्रसेन जी ने खेती किसानी के सभी काम किए। पशु भी चराए। रोहतक में एक चाचा चंदगीराम थानेदार थे। उनके सान्निध्य में लेथ मशीन और इंजन बोरिंग का काम सीखा। बालपन से ही सरल, सादे, ईमानदार और नैतिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले आस्तिक स्वभाव के थे। स्वाधीनता सेनानी परिवार में जन्म लेने के कारण देश-प्रेम रग-रग में था। लाला लाजपत राय, भाई परमानंद और सरदार भगत सिंह जैसे वीर सेनानियों का परिवार में आना जाना था। समाज-सुधार के लिए समर्पित आर्य समाज की संस्थाओं मेंशुरू से ही सक्रिय थे। आजादी के अगले बरस जींद की परमेश्वरी देवी के साथ प्रणयसूत्र में बंध गए। जिम्मेदारियां और बढ़ गईं। इसके अगले साल 1949 में मित्रसेन जी ने सोनीपत में एटलस साइकिल बनाने वाली कंपनी में काम शुरू किया। फिर रोहतक में बिजलीघर में भी कामकाज किया। यही वह दौर था, जब वह स्वाध्याय, सत्संग, व्यायाम, प्राणायाम और ईश्वर भक्ति में भी रमे हुए थे। हिंदी सीखी और सत्यार्थ प्रकाश का विषद अध्ययन किया। 1954 में उन्होंने उदयपुर के एक कारखाने में एक सौ पचास रुपये प्रति माह के वेतन पर काम किया, लेकिन कुछ समय उपरांत रोहतक लौटे और साझेदारी में लेथ एंड इंजन बोरिंग के नाम से कारखाना स्थापित कर अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर दिया। हालांकि वह कभी जिक्र नहीं करते थे परंतु हिंदी आंदोलन में गिरफ्तारी के उपरांत जब करीब दो महीने बाद रिहा होकर आए तो साझेदार के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा परंतु वह हताश नहीं हुए और दूसरा कारखाना खरीद लिया, जिसमें उन्हें आशातीत सफलता हासिल हुई। 
तीस वर्ष की आयु में 1961 में मित्रसेन जी ने रोहतक से हजारों मील दूर बिहार से सटे उड़ीसा के बड़बिल में रोहतक इंजीनियरिंग वर्क्स के नाम से कारखाना शुरू किया था। बाद में उन्होंने यहां कालेज की स्थापना भी की। हालांकि हरियाणा के नाम से राज्य 1966 में अस्तित्व में आया परंतु दूरदर्शी मित्रसेन जी ने 1964 में ही नवांमंडी (सिंहभूम) बिहार में हरियाणा इंजीनियरिंग वर्क्स के नाम से कारखाने की स्थापना कर दी थी। 1965 में जोड़ा, क्योंझार उड़ीसा में सिंधु इंजीनियरिंग वर्क्स की स्थापना हुई और इसके तीन वर्ष बाद 1968 में तीन ट्रक खरीदकर उन्होंने माइनिंग ट्रांसपोटिंग का काम शुरू कर दिया। बाद में इसका विस्तार करते चले गए। वह टाटा स्टील एंड आयरन कंपनी औरउड़ीसा माइनिंग कारपोरेशन लिमिटेड के कांट्रेक्टर बने। मित्रसेन एंड कंपनी के नाम से उड़ीसा बिजली बोर्ड के कांट्रेक्टर रहे। वह 1976 का वर्ष था, जब उन्होंने नेशनल इंजीनियरिंग वर्क्स के नाम से कारखाना शुरू किया। 1979 मेंउनके सुपुत्र वीरसैन सिंधु काम काज में हाथ बंटाने के लिए बड़बिल पहुंचे। 1981 में वृतपाल पहुंचे और 1982 में कैप्टन रूद्रसैन भारतीय सेना से अवकाश ग्रहण करने के उपरांत पहुंच गए। इन तीनों के आने से औधोगिक इकाइयों ने नए आयाम स्थापित किए। चाहे वह क्रोमाइट माइन्स प्रोजेक्ट हो, बोकारो स्टील थर्मल प्लांट हो या चंद्रपुरा थर्मल प्लांट-उन्होंने नई ऊंचाईयां हासिल की। 
उनके तीन अन्य सुपुत्रों कैप्टन अभिमन्यु, मेजर सत्यपाल सिंधु और देवसुमन सिंधु ने भी बाद में कमान संभालनी शुरू की तो उड़ीसा, छत्तीसगढ़, बिहार, मध्य प्रदेश और दूसरी जगहों पर स्थित उधोगों ने और गति पकड़ ली। बाद के वर्षों में उन्होंने खनन, ट्रांसपोर्ट, कोलवाशरी, आयरन, मैगनीज से जुड़ी इकाईयों का न केवल विस्तार किया, वरन स्टील प्लांट, थर्मल पावर प्लांट, सीमेंट उद्योग, होटल व्यवसाय, फाइनैंस एवं स्टाक ब्राकिंग, कृषि फार्म और मीडिया के क्षेत्र में भी सफलता के नए-नए आयाम स्थापित किए। बेशक शुरू में तमाम तरह की मुश्किलों ने उनकी राह को कठिन बनाया परंतु वह कभी भी विचलित नहीं हुए और कर्त्तव्य पथ से डिगे नहीं। यही कारण है मित्रसेन आर्य ने देश के सफलतम उद्योगपतियों में अपना नाम शुमार किया और हर हालातों में जरूरतमंदों के साथ मजबूती से खड़े रहकर ऐसा श्रेष्ठ व अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी बहुत कम मिसाल देखने को मिलती है।

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