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नया हरियाणा

शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

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फैज़ अहमद फैज़ का अपनी पत्नी के नाम खत

फैज़ अहमद फैज उर्दू के लोकप्रिय साहित्यकार रहे हैं।

फैज़ अहमद फैज़, naya haryana, नया हरियाणा

21 नवंबर 2018



नया हरियाणा

पुण्यतिथि पर स्मरण 
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ll पत्नी के नाम एक ख़त ll

आज तुम्हारा ख़त मिला, बड़ी राहत हुई। आज हमारी शादी की सालगिरह है। दुआ है कि तुम्हें (बल्कि हमें) ये दिन कई बार देखना नसीब हो। इन दस बरस में बहुत-सा सुख देखा है, और थोड़ा-सा दुख भी। लेकिन हमने ये तमाम दिन दयानतदारी, सुकून-ए-ख़ातिर से गुज़ारे हैं और ज़िंदगी में सबसे अहम बात यही है। तो आओ उन बीते हुए दिनों का शुक्राना अदा करें। ये दस बरस ऐसी दौलत है जिसे कभी फ़ना नहीं, और जिसे कोई छीन नहीं सकता। अगर किसी का उक़बा (परलोक) या आसमानी एहकामात (ईश्वरीय आदेश) पर ईमान न हो, तो नेकी और अख़लाक़ (सदाचरण) के हक़ में सबसे बड़ी दलील यही है कि जो लम्हा हक़-ओ-सदाक़त की परवरिश (यथार्थ और सच्चाई को बढ़ाने) में गुज़रे वह बजाय-खुद ख़ुशी का ऐसा ख़ज़ाना बन जाता है जिसे कोई रहज़न लूट नहीं सकता, न कोई जाबिर (आततायी) ज़ब्त कर सकता है। शायद मज़हबी इस्तिलाह (धर्म की परिभाषा) में तोश-ए-आख़िरत (परलोक के संचित पुण्य धन) के सही यही हैं।

तुमने अपने घर की तनहाई का ज़िक्र किया है, मैं जानता हूँ कि यह तनहाई कितनी कड़ी और जुदाई के ये लम्हे कितने गराँ (भारी) हैं। इनको दिल से धोया तो नहीं जा सकता, लेकिन इनका बोझ इस तसव्वुर से कम ज़रूर किया जा सकता है कि बीते हुए दिन कैसे अच्छे थे और आने वाले दिन कितने बेहतर होंगे। मैं तो यही करता हूँ। जब से जेलखाने का दरवाज़ा बंद हुआ है मैं कभी माज़ी के पैरहन (विगत के वस्त्र) को तार-तार करके उसे मुख़्तलिफ़ (विभिन्न) सूरतों में दुबारा बुनता रहता हूँ, और कभी आने वाले दिनों को दाम-ए-तसव्वुर में मुक़य्यद (कल्पना के जाल में क़ैद) करके उनसे अपनी मर्ज़ी और पसंद के मुख़्तलिफ़ मुरक़्क़े (अलबम) तरतीब देता रहता हूँ। जानता हूँ कि यह बेकार-सा शग़ल है, इसलिए कि ख़्वाबों को हक़ीक़त की ज़ंजीरों से आज़ाद नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना ज़रूर है कि थोड़ी देर के लिए आदमी तख़य्युल (कल्पना-शक्ति) के बल पर गिर्द-ओ-पेश (चारों ओर) की दलदल से पाँव छुड़ा सकता है। फ़रारियत (पलायन) बुरी बात है। लेकिन जब हाथ-पाँव जकड़े हुए हों तो आज़ादी की वाहिद (एकमात्र) सूरत यही रह जाती है। इसी नुस्ख़े के तुफ़ैल (बहाने) मुझे जेल की सलाखें बहुत ही हक़ीर (तुच्छ) और बेहक़ीक़त दिखाई देने लगी हैं, और बेश-तर औक़ात (बहुधा) उनकी तरफ़ ध्यान ही नहीं जाता।

तुम कहोगी कि हम बुक़राती ऊँचा फ़लसफ़ा छाँट रहे हैं, इसलिए आओ कोई और बात करें।

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