Privacy Policy | About Us | Contact Us

नया हरियाणा

शनिवार, 23 जून 2018

पहला पन्‍ना English लोकप्रिय हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप

जैविक खेती के माध्यम से किसान विकसित कर रहे हैं रोजगार के नए अवसर

दरअसल अब किसानों को खेत और बाजार के बीच में जो खाई थी, उसे पाटकर आगे बढ़ना होगा। ताकि किसानों को फसल की कीमत मिल सकें और रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकें।

Farmers are developing new jobs through organic farming, naya haryana, नया हरियाणा

13 दिसंबर 2017

नया हरियाणा

एक तरफा फसल उत्पादन की ओर भागता किसान न केवल फसल का उचित मूल्य प्राप्त करने से वंचित रहा है, बल्कि अपना अस्तित्व ही मिटाता जा रहा है। भारतीय राजनीति में वोट बैंक की तरह उसका इस्तेमाल भी होता आया है । बहुआयामी चुनौतियों का सामना करता ऋणग्रस्त किसान आखिर मनुष्य ही है। मुसीबत में वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भुलावे में फंस जाता है। किसान इन परिस्थितियों में रेडिमेड कृषि संसाधनों जैसे रासायनिक खाद, तथाकथित उन्नत बीज, कीटनाशकों और यहां तक कि ग्रोथ प्रमोटर एवं अधिक उत्पादन दिलाने वाले कई उत्पादों के चक्कर में फंस जाता है, परिणाम हमारे सामने है।  क्योंकि जब एक बार निर्जीव मिट्टी सजीव हो जाएगी तो निश्चित है उत्पादन एवं उत्पादक्ता बढ़ने के साथ किसानो की समृद्धि भी बढ़ेगी ही । 
इससे न केवल रसायनों पर होने वाला व्यय एवं ऊर्जा का अपव्यय बचेगा, बल्कि कई बहुआयामी लाभ, जैसे मानव स्वास्थ्य के लिए उत्तम कृषि उत्पाद, फल, सब्जियाँ आदि प्राप्त होगी। जिससे मानव में रोग प्रतिरोध क्षमता भी निश्चित ही बढ़ेगी। औषधियों पर खर्च में कमी आएगी, साथ ही बायो एनर्जी का सदुपयोग मिट्टी की सजीवता के लिए संजीवनी सिद्ध होगा। 
कृषि लागत में कमी से किसानों के लिए सुकून से जीने का अवसर प्राप्त हो सकेगा। कृषि पर लागत अनाप-शनाप बढ़ती गई एवं कर्ज में डूबते किसान सामाजिक पारिवारिक जिल्लतों को न झेल पाने के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। देश को विकसित करने के लिए जरूरी है कि गांवों का भी विकास हो। देश को विकसित राष्ट्र की पंक्ति में खड़ा करने के हमारे प्रयासों का केन्द्र बिंदु ये गांव ही होने चाहिए। अब किसानों को खेती के साथ-साथ खेती उत्पादों के व्यापार में खुद ही उतरना होगा, ताकि उन्हें अपने उत्पादन की उचित कीमत मिल सकें।
वर्तमान समय में आवश्यकता यह है कि हमें विकास को देश, काल एवं परिस्थितियों के अनुरुप किसानों को सही दिशा देने की।  हम जब तक एकात्म विकास को नही समझेंगे, स्वीकार नहीं करेंगे एवं अपनाएगे नहीं तब तक सर्वागीण विकास नहीं होगा । एकात्म विकास वस्तुत: सर्वागीण विकास ही है। जिसमें किसानों को खासकर युवाओं को स्व-रोजगार के क्षेत्र में उतरना पड़ेगा, क्योंकि सभी युवाओं को सरकारी नौकरी मिल पाना संभव नहीं। जबकि रोजगार के अवसर पैदा करने वाली सरकारी स्कीमों के माध्यम से किसान खुद को मजबूत कर सकते हैं।
दरअसल हरित क्रांति का असर अब लगभग समाप्त-सा हो गया है और रासायनिक उर्वरकों के साथ कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग की वजह से हाल ही के वर्षो में भूमि की उर्वरा शक्ति अत्यधिक क्षीण होने से गेहूं उत्पादन और उत्पादकता दोनों में भारी कमी आई है। सिंचित क्षेत्रों के साथ कृषि ऋणों का दायरा बढ़ाने पर भी जोर दिया जाने लगा है। कृषि ऋण ही तो किसान को पथभ्रष्ट कर रहे हैं और यें ही आत्महत्या के लिए उत्तरदायी भी हैं । बीटी कपास एंव बीटी धान की तरह ही गेहूं में भी ऐसा ही कोई प्रयोग करने की वकालत की जाने लगी है । किंतु बीटी प्रजाति अथवा जीएम प्रजाति से आसन्न खतरों की तरफ से जान बूझकर आँखें मूंद ली गई है। मर्ज कुछ और है और दवा कुछ और दी जा रही हैं। वस्तुत: इस विकराल समस्या का हल सिंचित कृषि क्षेत्र बढ़ाना, कृषि ऋण का दायरा बढ़ाना, बीटी प्रजाति, मेक्सिकन ड्वार्फ वेराईटी गेंहू अथवा रासायनिक उर्वरकों के चलन को बढ़ाना बिल्कुल नहीं है । ये सभी विकल्प तो इस समस्या को बढ़ाएगे ही। साथ ही इससे कभी न सुलझाने वाली समस्या का जन्म होगा। 
इस समस्या का एक हल है- भारत की पारंपरिक खेती। जबकि गेंहू की जिन प्रजातियों से हरित क्रांति संभव हुई है वह भरपूर पेट्रोलियम ऊर्जा, पानी, रासायनिक खाद एवं विद्युत आपूर्ति पर निभर है । एक बार में ही मिट्टी की समूची ऊर्जा का दोहन कर मिट्टी को निर्जीव बना डालने के बाद हमें यह सफलता प्राप्त हुई है। हरित क्रांति  के चमत्कारिक परिणामों, मशीनीकरण एवं रासायनिक खेती से जितना आर्थिक लाभ किसान को मिला, उससे कहीं अधिक उसने खोया है। इतना ही नहीं किसान ने इस दौरान अपनी संवेदनशीलता भी खोई है। 
कृषि को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक नए वैज्ञानिक चिंतन की आवश्यकता है जिसमें जीवन के मूलभूत सिद्धांतों की अवहेलना न हो। स्थायित्व देने वाली सदाबहार कृषि क्रांति की बात हम तभी कर सकते हैं जब किसानों का संसाधनों, ऊर्जा और फसल भंडारण एवं बाजार में सीधे उतरकर ही संभव हो सकता है। जब प्रोज्यूमर (उत्पादक – उपभोक्ता) सोसायटी अस्तित्व में आ जाए। प्रथम हरित क्रांति के चालीस साल बाद आज भारतीय खेती विचित्र संकट के दौर से गुजर रही है। इन संकटों के बादलों से निकलने का रास्ता भी किसानों को ही निकालना होगा। हरित क्रांति के सभी व्यावहारिक उद्देश्य आज ध्वस्त हो चुके है । एक ओर किसानों द्वारा आत्महत्याओं  का दौर जारी है, वहीं योजनाकार और कृषि वैज्ञानिक दूसरी हरित क्रांति की नींव रखने में व्यस्त हैं । 
दरअसल अब किसानों को खेत और बाजार के बीच में जो खाई थी, उसे पाटकर आगे बढ़ना होगा। ताकि किसानों को फसल की कीमत मिल सकें और रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकें।
 


बाकी समाचार