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नया हरियाणा

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

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हरियाणा में क्या रहेगा केजरीवाल का राजनीतिक भविष्य!

जानिए केजरीवाल ने कौन से कदम सही उठाये और कौन से गलत!

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19 नवंबर 2018

नया हरियाणा

किसी समय देश के राजनैतिक मानचित्र पर भारतीय जनता पार्टी के सशक्त विकल्प में उभर रही आम आदमी ( ‘आप ‘) पार्टी को गोवा और पञ्जाब विधानसभा चुनावों के ख़राब परिणामों ने इतनी निराशाजनक स्थिति में धकेल दिया कि ‘आप’ अस्तित्व के संकट से झूझती दिखी । इसी बीच हरियाणा में हिसार में आयोजित एक जनसभा में आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने अगामी चुनावों में हरियाणा की सभी दस लोकसभा एवं नब्बे विधानसभा हलकों से आप पार्टी के प्रत्याशी उतारने की घोषणा कर के प्रदेश का राजनैतिक अखाड़े में ताल ठोक दी । गौर-तलब है कि अरविन्द केजरीवाल हरियाणा की सिवानी मण्डी से सम्बन्ध रखते हैं ,और गृह-राज्य की स्थानीय राजनीति में केन्द्रीय भूमिका में आने की उनकी ललक भी समझ में आती है , जिसका खुलासा उन्होंने हाल में ही चण्डीगढ़ में आयोजित एक पत्रकार सम्मेलन में भी किया है ।सबको चौंकाते हुए अरविन्द केजरीवाल ने घोषणा भी कर दी कि अगामी विधानसभा चुनाव में हरियाणा मुख्य-मन्त्री पद के लिए नवीन जयहिन्द आप पार्टी का चेहरा होंगे । आप पार्टी के हरियाणा में सम्भावित प्रदर्शन का वस्तुनिष्ठ आकलन के लिए आप पार्टी के अतीत और राजनैतिक परिदृश्य पर विहंगम दृष्टिपात करते हैं।
आप पार्टी का प्रादुर्भाव साल 2012 में अन्ना हजारे के जन-आन्दोलन से छिटक कर राजनीति से भ्रष्टाचार के उन्मूलन के इकहरे नारे से हुआ था-इकहरा इसलिए कि जटिल राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक ,राजनैतिक और प्रशासनिक मुद्दों पर आप में कभी कोई गम्भीर विमर्श हुआ ही नहीं ।आप पार्टी के घोषणा-पत्र और अरविन्द केजरीवाल के भाषणों में सार्वजनिक जीवन मे पारदर्शिता और स्वच्छता का एकमात्र मूल-मन्त्र था , व साथ में था दूसरे दलों से गुणात्मक रूप से अलग होने का - खुद की कमीज दूसरों से ज्यादा उज्ज्वल-धवल होने का दर्प-पूर्ण एहसास ।साल 2013 में दिल्ली विधान-सभा में पूर्ण बहुमत न मिलने पर भी अरविन्द केज़रीवाल ने कांग्रेस पार्टी को हाशिए में धकेल कर चुनावी राजनीति में विस्फोटक आगाज़ किया , वहीं बतौर मुख्य-मन्त्री धरने पर बैठ कर अराज़कतावादी होने का ठप्पा भी उन्होंने अपने ऊपर लगवाया ।मुख्य-मन्त्री पद से इस्तीफा देकर जँहा अरविन्द केज़रीवाल ने पलायनवादी होने का सबूत दिया, वहीं वाराणसी से नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध ताल ठोक कर उन्होंने परिस्थितियों के बहाव के विरुद्ध तैरने का माद्दा दिखाया ।इसका प्रतिफल उनको फरवरी 2015 के दिल्ली विधानसभा में मिला जब उन्होंने 70 में से 67 सीट जीत कर मोदी-शाह के अश्वमेध के घोड़े को रोक दिया ।उस वक्त अरविन्द केज़रीवाल भारतीय राजनैतिक गगन में सबसे देदीप्यमान नक्षत्र थे । आप पार्टी को भाजपा का विकल्प बनाने की महत्वाकांक्षा के चलते उन्होंने कांग्रेस से इतर धर्म-निरपेक्ष दलों , मसलन तृण मूल कांग्रेस ,बीजू जनता दल, टी.डी.पी ,बिहार के जे.डी.यू़. तथा डी.एम.के. सरीखे दलों के साथ खुद की अगुवाई में तीसरा मोर्चा बनाने के प्रयास तेज कर दिए , जिसमें नितीश कुमार के एन.डी.ए. में शामिल होने से व दीगर दलों की महत्वाकांक्षाओं के चलते पलीता लग गया ।
बतौर मुख्य-मन्त्री अरविन्द केज़रीवाल का रिकॅार्ड औसत रहा है ।शिक्षा में आप सरकार ने जँहा सार्थक पहल कर के सरकारी विद्यालयों के काम-काज़ में सुधार किया है ,वहीं बिजली पानी की दरों में कटौती करके आम नागरिक को राहत दी है ।मोहल्ला क्लीनिक की पहल तो अच्छी है ,परन्तु व्यावहारिक क्रियान्वयन के अभाव में तथा दीर्घ-कालीन वित्तीय और प्रशासनिक योजना के अभाव में यह पहल दम तोड़ती नजर आती है ।निजी स्कूलों और हस्पतालों को लगाम डालने के आप सरकार के प्रयास इतने प्रभावशाली नहीं रहे । सार्वजनिक वितरण-प्रणाली जस की तस है । नगरपालिका , केन्द्र सरकार व दिल्ली उप राज्यपाल से समन्वय के अभाव में महत्वपूर्ण परियोजनाएं अटकी पडी़ हैं और सफाई का बुरा हाल है ।नरेन्द्र मोदी का विकल्प बनने के चक्कर में अरविन्द केज़रीवाल दिन में तीन –तीन बार प्रैस कांफ्रैंस करके प्रधान-मन्त्री की तीख़ी आलोचना करते थे , जिस पर गोवा , पञ्जाब विधानसभा एवम् दिल्ली नगर निगम के चुनावों में आप पार्टी के बद से बदतर होते प्रदर्शन से ही लगाम लगी ।विद्रोही तेवर व अहम्मन्यता से आप एक्टिविस्ट बन सकते हैं ,सरकार चलाना युक्ति और धैर्य का काम है ।
राजनेता जब सफलता के शिखर पर होते हैं, तो सफलता को पचा न पाने पर सफलता के पड़ाव ही पतन की फ़िसलन भरी ढ़लान बन जाती है –यही अरविन्द केज़रीवाल के साथ हुआ ।तानाशाही और दम्भपूर्ण रवैया अपनाते हुए उन्होंने आप पार्टी में विरोध के सुरों का दमन करके आप में आन्तरिक लोकतन्त्र का पूर्ण क्षरण कर दिया-यहाँ तक कि पार्टी के संस्थापना के सहयोगी शशि भूषण , प्रशान्त भूषण और योगेन्द्र यादव जैसे दिग्गजों को भी आप से चलता कर दिया गया ।कपिल सिब्बल , विक्रम मजीठिया और अरुण जैतली जैसे नेताओं पर उन्होंने भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगाए सो लगाए , उक्त महानुभावों के मानहानि के दावे दायर करने पर माफ़ी माँग कर खुद की फज़ीहत करवाई वह पद की गरिमा के अनुकूल तो बिल्कुल नहीं था ।अराज़कता के आरोप का दंश झेल रही आप पार्टी के अध्याय में सबसे काला अध्याय तब जुड़ गया जब दिल्ली के मुख्य-सचिव ने 19 फरवरी, 2018 की रात को मुख्य-मन्त्री निवास पर देर रात हुई मीटिंग में अपने साथ अरविन्द केज़रीवाल की उपस्थिति में हुई मारपीट को लेकर आप पार्टी विधायकों अमनतुल्ला खाँ और प्रकाश जरवाल के विरुद्ध एफ.आई.आर.दर्ज करवा दी ।आप पार्टी ने हालाँकि इसका खण्डन किया है , पर मुख्य सचिव अँशु प्रकाश की मैडिकल रिपोर्ट , मुख्य-मन्त्री निवास पर घटना के सीसीटीवी से पुलिस की जाँच में छेड़छाड़ की पुष्टि तथा अरविन्द केज़रीवाल के सलाहकार जिनको उन्होंने सेवा-निवृत्ति के बाद नियुक्त किया था ,के बयान कुछ और ही संकेत करते हैं ।
इसका लब्बो-लुआब यह हुआ कि आई.ए.एस. अधिकारियों की एसोसिएशन ने सरकार के लिखित आदेश ही मानने का ,और कैबिनेट मीटिंग छोड़कर अन्य बैठकों में हिस्सा 


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