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चौधरी की चौपाल : दो उरे की, दो परे की!

इनेलो में मचे घमासान के बीच इतिहास की पड़ताल।

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17 नवंबर 2018

रणदीप घनघस

चौधरी की चौपाल: दो उरे की दो परे की

इनेलो की महाभारत ने  इतिहास से सीख ले भविष्य की कामना कर ली है। नहीं तो भारतीय लोकदल वाले हालात बन जाते।

अजय चौटाला के जींद में  नया डंडा, नया झंडा, नई पार्टी बनाने की ओर इशारा करने से  जहाँ एक ओर अभय चौटाला ने राहत की सांस ली। वही पार्टी व चुनाव चिन्ह के दावे पर कानूनी  लड़ाई से भी बच गए।

बात 1987 की है। जब चौधरी चरण सिंह  का भारतीय लोकदल दो फाड़ हुआ  और  चौधरी देवीलाल ने बहुगुणा को समर्थन दे दिया और लोकदल (ब) बना लिया। दूसरी और  चौधरी अजित सिंह ने लोकदल (अ)बना लिया।
  पर दोनों दलों ने भारतीय लोकदल के चुनाव चिन्ह पर कानूनी दावा कर दिया।  पर हुआ ये की लम्बी लड़ाई  के बाद चुनाव चिन्ह किसी तीसरे को  मिल गया और आज भी अलीगढ़ के सुनील सिंह  लोकदल और उसके चुनाव चिन्ह हलधर के  प्रयोग कर्ता है।
ऐसा ही 1969 में कांग्रेस के साथ भी हुआ था जब कामराज ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस से निकाल दिया और   कांग्रेस दो फाड़ हो गई।  एक कांग्रेस (आई) और कांग्रेस (ओ)।  जब चुनाव चिन्ह पर दावे की बात आयी तो चुनाव आयोग ने गाय बछड़ा  चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया।
खैर आज इनेलो का चुनाव निशान चश्मा केसम-केस होने से बच गया।

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