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नया हरियाणा

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

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स्वामी विवेकानंद : भारत के लिए मानव संस्कृति का विकास है जरूरी

उनका कहना था कि `नया भारत किसानों के हल, मजदूरों की भट्टी, झोपड़ियों, जंगलों, किसानों और मजदूरी से जन्म लेगा ।’


Swami Vivekananda: India needs to develop human culture., naya haryana

13 दिसंबर 2017

नया हरियाणा

स्वामी विवेकानन्द (जन्म: 12 जनवरी, 1863 - मृत्यु: 4 जुलाई, 1902) वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत "मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनों" के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली परिवार में जन्मे विवेकानंद आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीव स्वयं परमात्मा का ही एक अवतार हैं; इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद विवेकानंद ने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और ब्रिटिश भारत में मौजूदा स्थितियों का पहले हाथ ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कूच की। विवेकानंद के संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया , सैकड़ों सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में, विवेकानंद को एक देशभक्त संत के रूप में माना जाता है और इनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

“जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो। उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो।’ जो बातों का बादशाह नही, बल्कि उसे करके दिखाता है। वही प्रेरक इतिहास रचता है।“ विवेकानन्द स्व प्नदृदष्टाि थे। उन्होंईने एक ऐसे समाज की कल्पतना की थी जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्यस-मनुष्यष में कोई भेद न रहे। उन्हों्ने वेदान्त के सिद्धान्तों को इसी रूप में रखा। 
समता के सिद्धान्त का जो आधार विवेकानन्दे ने दिया उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूँढा जा सके। विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उन्होंने यह विद्रोही बयान दिया था कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये। 
उनका कहना था कि दुनिया के सभी धर्म एक ही ध्येय की तरफ जाने के अलग अलग रास्ते हैं। इन्सान की सेवा ही सच्चा धर्म है। ऐसी शिक्षा उन्होंने भारतीयों को दी। उन्होंने जाति व्यवस्था पर प्रहार किया एवं  मानवतावाद और विश्वबंधुत्व का प्रसार किया। एक प्रार्थना सभा में विवेकानंद ने कहा था- भाइयों! कहो कि नंगा भारतीय, अशिक्षित भारतीय, हरिजन भारतीय मेरा भाई है। बहनों! अपनी आवाज और ऊंची उठाकर कहो कि भारत में सिर्फ मानव ही आराध्य है। भारत के लिए मानव संस्कृति का विकास बहुत जरुरी है। आज वर्तमान समय में विवेकानंद के विचारों पर ध्यान देना अधिक प्रासंगिक है, उनका कहना था कि `नया भारत किसानों के हल, मजदूरों की भट्टी, झोपड़ियों, जंगलों, किसानों और मजदूरी से जन्म लेगा ।’
 

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