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नया हरियाणा

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

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जानिए अमर शहीद करतार सिंह सराभा के बलिदान की कहानी

शहीद करतार सिंह सराभा के शहीद भगत सिंह के गुरु भी थे.

The story of the sacrifice of Amar Shahid Kartar Singh Sarabha, naya haryana, नया हरियाणा

16 नवंबर 2018

नया हरियाणा

भारत का इतिहास देश-भक्तो की कुर्बानियों से भरा हुआ हैं। ब्रिटिश साम्राज्य के कायम होने से पहले गुरु गोबिंद सिंह, छत्रपति शिवाजी और महाराणा प्रताप के देशभक्ति से भरे कारनामो को कौन भूल सकता हैं? जब देश अंग्रेजों के अधीन था तो कुर्बानी के पुतले देशभक्तों ने आजादी के लिए एक लम्बा संघर्ष किया।

करतार सिंह सराभा का नाम इन देशभक्त शहीदों में सब से ऊपर आता हैं। उन्होंने ग़दर पार्टी में शामिल हो कर 20वीं सदी के आरम्भ में देश की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी साम्राज्य से तब मोर्चा लिया, जब सारी दुनिया में ब्रिटिश सामराज्य की शक्ति की धाक थी।

करतार सिंह सराभा का जन्म 24 मई 1896 ईस्वी में गाँव सराभा, जिला लुधियाना (पंजाब) में हुआ। इनके पिता जी का नाम सरदार मंगल सिंह और माता जी का नाम साहिब कौर था। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह थी की करतार सिंह सराभा के सिर पर अपने पिता का साया बचपन से ही उठ गया। उनका पालन पोषण उनके दादाजी सरदार बदन सिंह ने किया। बचपन में जब करतार सिंह सराभा स्कूल में पढ़ते थे तो उनकी फुर्ती और रुचियों के कारण उनके स्कूल के साथी उन्हें “अफलातून” कह कर बुलाते थे।

उड़ीसा में मेट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद आगे की पढ़ाई करने के लिए वह 1911 में अमरीका चले गये। 1912 में उन्होंने बरक्ले यूनिवर्सिटी से रसायन विज्ञान की पढ़ाई शुरू कर दी। अपनी पढ़ाई का खर्चा उठाने के लिए वह मजदूरी करने लगे। मजदूरी करने के दौरान उन्होंने हिंदी मजदूरों से हो रहे नस्लीय भेदभाव को देखा और उनके मन में अंग्रेजो के विरुद्ध नफरत पैदा हो गयी। जून 1912 में उन्होंने हिंदी नौजवानों को इकट्ठा करके पहली तकरीर करते हुए भारत को आज़ाद करवाने की कोशिश करने के लिए प्रेणना दिया।

प्रसिद्ध देशभक्त लाला हरदयाल का जोशीला भाषण सुन कर वह देश के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार हो गये। 21 अप्रैल 1913 को अमरीका में हिंदी मजदूरों ने ग़दर पार्टी की स्थापना की और “ग़दर” नाम का साप्ताहिक अखबार निकालने का फैसला किया। अखबार की जिम्मेवारी संभालने के साथ ही करतार सिंह सराभा ने युद्ध का परिक्षण भी लेना प्रारम्भ कर दिया। इस अखबार ने सभी पंजाबीयों के दिलों में आजादी के लिए कुर्बानियां देने का जोश भर भर दिया। इस समाचार पत्र में जोशीले देशभक्ति से परिपूर्ण कवितायेँ छपती थी।

25 जुलाई 1914 में जब अंग्रेजो और जर्मन में लड़ाई शुरु हो गयी तो ग़दर पार्टी की अपील पर हज़ार ग़दरी हिंदुस्तान की ओर चल पड़े। बहुत सारे गदरी कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) के बंदरगाहों में पकड़े गये।

करतार सिंह सराभा लंका के रास्ते भारत पहुचे और अंग्रेजो से छिपकर देश की आज़ादी के लिए काम करने लग पड़े। उन्होंने ग़दर पार्टी का प्रचार किया, हथियार इकट्ठे किये, बम बनाये और फौज में भी आज़ादी का प्रचार किया।

ग़दर पार्टी ने अंग्रेजों के विरुद्ध देश भर में ग़दर करने के लिए 21 फरवरी 1915 का दिन निर्धारित किया। लेकिन गद्दार मुखबीर किरपाल सिंह के जरिये ब्रिटिश सरकार को इसकी सूचना मिल गयी। तब इसकी तारीख को बदल कर 19 फरवरी कर दिया गया, लेकिन फिर भी मुखबीर के जरिये अंग्रेजो को तारीख बदलने का भी पता चल गया। सरकार ने फौजीयों से हथियार छीन लिए और उन्हें निहत्ता कर दिया और गदरियों को ग्रिफ्तार करना शुरू कर दिया। करतार सिंह सराभा, हरनाम सिंह टूंडीलाट और जगत सिंह ने पहले अफगानिस्तान भागने का विचार किया, लेकिन कुछ देश भक्ति की कवितायें याद आने पर उन्होंने भारत को छोड़ कर जाने का विचार ही त्याग दिया। वह सभी चक्क नम्बर 5 में अपने एक हमदर्द रसालदार गण्डा सिंह के पास गये, जिसने उन सबको ग्रिफ्तार करवा दिया।

करतार सिंह सराभा और उनके साथियों के विरुद्ध राजद्रोह, फौज को बिगाड़ने, डाकिया और कत्लों का मुकदमा चलाया गया। अदालत ने सराभा समेत 24 गदरियों को फांसी, 17 को उम्र कैद काले पानी और कुछ को कैद की सजायें सुनाई।

इन सभी सजाओं के विरुद्ध देश में हलचल पैदा हो गयी। इससे सरकार ने 17 गदरियों की फांसी को उम्रकैद में बदल दिया। 16 नवम्बर 1915 में करतार सिंह सराभा और उनके 6 साथियों को फांसी दे दी गयी। इस समय करतार सिंह सराभा की उम्र सिर्फ 19 साल थी। इन सभी गदरियों ने ग़दर की कवितायें गाते हुए फांसी की फंदे को पहना। ग़दर पार्टी के प्रधान बाबा सोहन सिंह भकना के अनुसार करतार सिंह सराभा हर काम में उनसे आगे रहा और कुर्बानी में भी वह उनको पीछे छोड़ गया। इस प्रकार करतार सिंह सराभा छोटी उम्र में ही देश की आजादी के लिए पुरे देशवासियों के मन में एक चिंगारी पैदा करके शहीद हो गये। जिसके परिणाम स्वरूप एक दिन ब्रिटिश साम्राज्य को भारत में से अपना बोरी-बिस्तरा गोल करना पड़ा।


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