Privacy Policy | About Us | Contact Us

नया हरियाणा

शनिवार, 15 दिसंबर 2018

पहला पन्‍ना English सर्वे लोकप्रिय हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप

खाली हाथ रह जाएगा अजय चौटाला का परिवार!

इनेलो परिवार में सत्ता संघर्ष की लड़ाई जगजाहिर हो चुकी है.

Jananayak Devilal, Omprakash Chautala, Ajay Chautala, Naina Chautala, Abhay Singh Chautala, Dushyant Chautala, Digvijay Chautala, INLD family power struggle, naya haryana, नया हरियाणा

16 नवंबर 2018

नारायण तेहलान

इस मौजूं पर कुछ लिखने से पहले एक बात साफ कर दूं कि मेरी निजी मान्यता के अनुसार चौटाला परिवार में पनपे विवाद का प्रदेश की राजनीति या प्रदेश की जनता के भले बुरे से कुछ लेना देना नहीं है। यह शुद्ध रूप में परिवार के साम्राज्य (dynastic domain and the right to rule ) पर वर्चस्व का संघर्ष है। इसमें सिर्फ राजनीतिक वर्चस्व की बात हो ऐसी बात भी नहीं है। इसमें कहीं न कहीं चौधरी देवीलाल मेमोरियल ट्रस्ट के अधिकारों और संपत्ति पर आधिपत्य जमाने और सिद्ध करने का सवाल भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।
मैं यह बात भी साफ कर देना चाहता हूं कि मुझे इनैलो को एक राजनीतिक पार्टी के रूप में स्वीकार करने में हिचक है। यह व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठाकर परिवार के गठजोड़ को दिया गया एक नाम मात्र है। इस से मिलने वाले सब अधिकारों और लाभों पर केवल परिवार वालों का और उनके खास चहेतों अधिकार है जबकि नुकसानों की भरपाई करना पूरी तरह से तथाकथित आम कार्यकर्ता (पार्टी की रीढ़) का कर्तव्य है। इसलिए मुझे उस समय आश्चर्य होता है जब कोई कार्यकर्ता (बड़े से बड़ा पदाधिकारी भी) यह कहता है कि मैंने त्यागपत्र दे दिया है या दे रहा हूं।
खैर अब हम मुख्य विषय पर बात करते हैं। मैं अजय चौटाला जी के करीब रहा हूँ लेकिन आयु में अंतर के कारण इतना करीब भी नहीं रहा जिसे अंतरंगता कहा जा सके। जहां तक अभय चौटाला का सवाल है मेरा कभी न तो सीधा संपर्क रहा और न संवाद। इसका कारण कुछ तो यह था कि वे उस समय सीधे सीधे पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों में बहुत कम हस्तक्षेप करते थे इस लिए कभी मिलना नहीं होता था। इसके इलावा एज फैक्टर भी एक फैक्टर था। इससे भी बड़ा कारण था अभय की एक अक्खड़ के रूप में प्रचारित छवि और मेरा अपना बागी दिमाग। यानी कहीं भी टकराव होने का अंदेशा। मेरे समाजवादी पार्टी से दूर होने के बाद जाट भवन चंडीगढ़ के वार्षिक उत्सव में संक्षिप्त सी मुलाकात हुई थी। डॉ एम एस मलिक (पूर्व डीजीपी हरियाणा) ने अभय जी को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था और मैं एक वक्ता की हैसियत में आमंत्रित था। उस समय अभय ने मेरे लिए जो सम्मान प्रदर्शन किया उसने मेरे उनकी उस उद्दंड छवि को काफूर कर दिया था। मैं आज भी यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि अभय एक गैरजिम्मेदाराना हद तक उद्दंड व्यक्ति है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि उसके बाद मेरा कभी संपर्क भी नहीं रहा।
लेकिन अजय जी के उस समय पार्टी पॉलिटिक्स में सक्रिय होने के कारण, और इस कारण भी कि उस समय तक चौधरी ओमप्रकाश चौटाला जी अजय को हर गतिविधि में आगे रखने लग गए थे, यानी एक तरह से युवराज घोषित कर दिया था, अजय के साथ निकट के संबंध रहे। अजय को दूसरे देवीलाल के रूप में चमचों ने प्रचारित करना शुरू कर दिया था। रणजीत प्रताप आदि के दूर जाने के बाद ओमप्रकाश चौटाला का साथ देने के लिए अजय के इलावा परिवार में और कोई था भी नहीं। अजय की सेहत शक्ल सूरत गंभीरता आदि चौधरी देवीलाल से मिलते भी थे। लेकिन जहां तक स्वभाव या फितरत या गुणों का सवाल है, मैं अगर कटु सत्य कहने की हिम्मत जुटाऊं तो कहूँगा कि दादा पोता दोनों के बीच एक बात खूब साझे की थी और वह थी "ईर्ष्या"। चौधरी देवीलाल हद्द दर्जे के ईर्ष्यालु व्यक्ति थे। उन्हें हमेशा नीचे को देखने वाले लोग पसंद थे। जिसने जरा आंखें ऊपर की नहीं कि उनकी नापसंदगी का शिकार हुआ नहीं। इसका एक कारण उनका कम पढा लिखा होना, दूसरा पारिवारिक अहंकार और तीसरा पारिवारिक मोह हो सकता है कि रहे हों।
अजय सदा मुस्कुराने वाले गंभीर प्रकृति के आदमी सभ्य शालीन थे इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन बहुत ईर्ष्यालु थे इसमें भी कोई संदेह नहीं। रामपाल माजरा मास्टर हरिसिंह का शिष्य साथी सहयोगी सेवक रहा। रामपाल को आगे बढाने में हरिसिंह का मुख्य योगदान था। मास्टर एक अनथक निष्ठावान कार्यकर्ता तो थे, चौधरी देवीलाल के अति चहेते और ओमप्रकाश चौटाला के दांए हाथ रहे लेकिन नेतृत्व के गुण होते हुए भी उनके अक्खड़ स्वभाव के कारण उभर नहीं पाए। धीरे धीरे उन्होंनें उभारने शुरू किये तब तक अजय मंच पर आ चुका था। मास्टर की टीम का मैं भी एक सदस्य था और उन्होंने हमेशा मुझे प्यार और इज्जत दी।
मंत्री तक उनको सेल्यूट करते थे और वे उड़ती सी स्वीकार्यता दिखाते थे। प्रोफेसर संपत सिंह के साथ उनका टकराव ज्यादा था। इसके बावजूद उनकी स्थिति सुरक्षित रहती अगर वे अजय को भी दूसरों की तरह से नहीं देखते। एक बार मास्टर ने कोई कार्यक्रम किया लेकिन अजय को नहीं बुलाया। मुझे याद है उस समय चौटाला जी ने कहा था कि उस छोरे नैं बुला लेते तो क्या बिगड़ जाता। यह एक सिग्नल था जिसे मास्टर या तो समझ नहीं पाए या फिर अति विश्वास में भरकर अनदेखा कर दिया।
सबसे पहले मास्टर को छोड़कर जाने वालों में रामपाल था जो इसके ईनाम स्वरूप विधायक भी बन गया। मास्टर धीरे धीरे कटता चला गया। फिर पार्टी के बाहर भी हुआ और चौटाला राज में घातक हमले का शिकार भी। इस सबके पीछे एकमात्र कारण अजय की नाराजगी रहा।
अब आकर यह भी सिद्ध हो गया कि अजय में धैर्य की कमी है। जब तक टकराव चाचा भतीजों के बीच में रहा भतीजों को भरपूर सहानुभूति मिलती रही। ज्यों ही माननीया नैना चौटाला अपने बेटों के लिए मैदान में आई मुकाबला दिखने लगा और सहानुभूति कम हो गई। अजय के खुलकर आने के बाद सहानुभूति का स्थान दबी हुई सी आलोचना लेने लग गई।
अगर विवाद कुछ दिन और भतीजों और चाचा के बीच चल जाता तो अभय का सूपड़ा साफ होना तय था क्योंकि तब अभय को आक्रांता के रूप में देखा जाता। नैना और अजय के खुलकर अभय के विरोध में आ जाने के बाद इस पूरे घटनाक्रम को मुकाबले के रूप में देखा जाने लगा।
मेरी यह पक्की धारणा है कि इस विवाद की जड़ में दिग्विजय का अतिआत्मविश्वास, सांसद भाई का लोभ, अजय का उतावलापन और मां का पुत्रमोह सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, नाते में दादा, घर के बड़े, पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत वाले व्यक्ति के सामने जो पैरोल पर है, हूटिंग करना करवाना या करने देना मूर्खता के अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता है।
भाग्य की बात है। अभय के हाथ अंतिम समय में हारी हुई बाजी जीत बनकर लग गई। अजय का परिवार अपने ही बिछाए जाल में खुद उलझकर रह गया जिसमें से बाहर निकलना नामुमकिन है। अगर निकलते हैं तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।


बाकी समाचार