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नया हरियाणा

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

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मौत का सौदागर बना शांति का मसीहा : अल्फ्रेड नोबेल

इस पूरी कहानी के कुछ शब्द भारतीय राजनीति में भी सुने जाते हैं, जैसे- मौत का मसीहा, बोफोर्स तौप घोटाले आदि.


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11 दिसंबर 2017

नया हरियाणा

दुनिया को डायनामाइट जैसी विस्फोट चीज देने वाले अल्फ्रेड नोबेल की संपत्ति से हर साल उन लोगों को सम्मानित किया जाता है जिन्होंने दुनिया को खुशहाल और शांतिमय बनाने में योगदान दिया है. नोबेल पुरस्कार विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार माना जाता है. शांति के लिए दिए जाने वाला नोबेल पुरस्कार ओस्लो में जबकि बाकी सभी पुरस्कार स्टॉकहोम में दिए जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि नोबेल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिए जाते.
वह 27 नवंबर 1895 युवा का दिन था. अल्फ्रेड नोबेल पेरिस स्थित अपने आवास से निकलकर स्वीडिश नॉर्वेजियन  क्लब पहुंचे थे. तब आविष्कारक, उद्योगपति, इंजीनियर और दौलतमंद जैसे उनके कई चेहरे थे, लेकिन वह चेहरा नहीं था, जिससे हम सारी दुनिया उन्हें पहचानती है. नोबेल एक टेबल पर बैठे और उन्होंने लिखना शुरु कर दिया. आरंभिक 4 पन्नों में उन्होंने यह लिखा कि उनकी संपत्ति में से उनके भतीजे, भतीजी और कर्मचारियों को क्या-क्या मिलना चाहिए. इसके बाद आगे के पन्नों में उन्होंने वह सब लिखा, जो उनकी वसीयत का शुमार इतिहास के महानतम दस्तावेजों में करवाता है. लेकिन उनकी कलम चलने से पहले उनके जीवन और मन में बहुत कुछ चल चुका था. इसकी शुरुआत हुई थी, 1818 में. उस साल एक दिन अल्फ्रेड नोबेल को वह पढ़ने का मौका मिला, जो कम ही लोगों को मिला होगा. उन्होंने अखबार में अपनी मौत की खबर पढ़ी. दरअसल, अल्फ्रेड के बड़े भाई लुडविग गुजर गए थे, लेकिन फ्रांसीसी पत्रकार ने गलती से उन्हें अल्फ्रेड समझ लिया. उस समाचार का शीर्षक था- ‘मौत के सौदागर की मौत’. नीचे उनके बारे में लिखा था- ‘अल्फ्रेड नोबेल, जो लोगों का मारने का सार्वकालिक तीव्रतम तरीका खोजकर अमीर बने.’ यह पढ़कर अल्फ्रेड को जोरदार झटका लगा. मरने के बाद दुनिया उन्हें किस रूप में याद करने वाली है, यह उनके सामने था. तब तक उन्हें दुनिया की इस राय का गुमान भी न था. आखिर ऐसा क्या बनता था नोबेल की फैक्ट्रियों में?  जवाब है, डायनामाइट!
1864 में नाइट्रोग्लिसरीन नामक विस्फोटक पदार्थ का प्रयोग करते हुए अल्फ्रेड के छोटे भाई एमिल और चार अन्य लोगों की धमाके में मौत हो चुकी थी. पूरा नोबेल परिवार हथियारों और विस्फोटकों के कारोबार में था. बरसों पहले, पिता इमानुएल को जब स्वीडन में दिवालिया होना पड़ा, तो वे रूस के सेंट पीटर्सबर्ग चले गए. वहां उनका हथियारों का व्यवसाय जम गया. उस समय अल्फ्रेड की आयु 9 साल थी. रूस का जार इमानुएल से खुश था. हालांकि बाद में युद्ध की समाप्ति पर उनका कारोबार मंदा होते-होते ध्वस्त हो गया. अलफ्रेंड को स्वीडन लौटना पड़ा. उन्हें पढ़ने के लिए फ्रांस भेजा गया. इस बीच 1847 में नाइट्रोग्लिसरीन का आविष्कार हो चुका था. अल्फ्रेड पेरिस में इंजीनियरिंग शिक्षा के दौरान इसी तैलीय, तरल विस्फोटक को बनाने वाले एस्चेनियो सोबरेरा के संपर्क में आए. उनके स्वीडन लौटने के बाद उनके परिवार ने नाइट्रोग्लिसरिन को लेकर प्रयोग शुरू किए और 1864 में हादसा हो गया.
 इसके बावजूद अल्फ्रेड का इरादा नहीं डिगा, बल्कि और दृढ़ हो गया. भाई की मौत के तीन साल बाद, 1807 में उन्हें सफलता मिल गई. प्रयोगों के दौरान उन्होंने देखा कि बलुआ पत्थर और स्लेट की तरह का एक महीन छिद्र युक्त अवसादी पत्थर सारा नाइट्रोग्लिसरीन सोख लेता है. चूर्ण के रूप में धमाके करने के लिए इसका इस्तेमाल पहले के मुकाबले काफी सुरक्षित था. अलफ्रेंड ने इस नए यौगिक को नाम दिया- डायनामाइट. यह बना है ग्रीक शब्द डायनेमिस से, जिसका अर्थ होता है-शक्ति. इसके बाद उन्होंने अपने आविष्कार का पेटेंट कराया और उसके उत्पादन के लिए यूरोप में कई फैक्ट्रियां लगाई.

 इस तरीके से उन्होंने अपार दौलत कमाई. उन्हें यूरोप का सबसे अमीर खानाबदोश कहा जाता था. खानाबदोश इसलिए, क्योंकि  तजिंदगी के ठिकाने बदलते रहे. 21 अक्टूबर, 1833 को स्वीडन के स्टॉकहोम में जन्मे, फिर नौ साल का होने पर रूस  चले गए. फिर पेरिस में पढ़ाई. वहीं निवास भी. 10 दिसंबर, 1896 को जब उनकी मौत हुई, वे इटली के सैनरेमो नामक  जगह पर थे. मौत से कुछ समय पहले उन्होंने बोफोर्स फाउंडरी का भी अधिग्रहण किया, जिसने बाद में बोफोर्स तोपें बनाईं. ये वही बोफोर्स तोपें हैं, जिनकी खरीद में घोटाले का आरोप राजीव गाँधी पर लगा था.
बहरहाल, तमाम कामयाबियों के बावजूद अल्फ्रेड नोबेल के जीवन में सुख और शांति नदारद थी. वह अपने पिता की 8 संतानों में एक थे, पर उन्होंने खुद को नितांत अकेला कहा था. वे प्यार के मामले में नाखुश रहे, कभी शादी नहीं की, जीवन भर बीमार रहे. अंततः 63 वर्ष की आयु में ही दुनिया छोड़ गए.
अखबार में छपी खुद की मौत की खबर ने इस मामले में उत्प्रेरक का काम किया. इस बीच और भी घटनाएं हुईं, जिन्होंने अल्फ्रेड को अपनी छवि के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया. एक बार वे गंभीर बीमार पड़े, तो सिर्फ 1 व्यक्ति उन्हें देखने आया था और वह भी उनका कर्मचारी था. लंबे सोच विचार के बाद, अंततः उन्होंने अपनी अधिकांश दौलत नोबेल फाउंडेशन के नाम कर दी. जिसका गठन उनकी मौत के बाद होना था. प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कारों के लिए अल्फ्रेड की संपदा का प्रबंधन यही फाउंडेशन करता है.
 तो 27 नवंबर 1850 को अपनी वसीयत के आरंभिक 4 पन्नों के बाद, उन्होंने फाउंडेशन और पुरस्कारों की रूपरेखा बनाई, जिसने उन्हें ‘मौत का सौदागर’ से ‘शांति का मसीहा’ बना दिया. उन्होंने लिखा कि उनकी दौलत से मिलने वाले वार्षिक ब्याज के 5 हिस्से किए जाएं. चार हिस्सों से भौतिकी, रसायनशास्त्र, चिकित्सा और साहित्य इन क्षेत्रों में साल के दौरान अपने काम से मानव जाति को महानतम लाभ देने वाले व्यक्ति, व्यक्तियों को पुरस्कृत किया जाए और पांचवे हिस्से से वैश्विक शांति के लिए काम करने वाले व्यक्ति को. (1969 से अर्थशास्त्र में भी पुरस्कार दिए जाने लगे, लेकिन तकनीकी तौर पर उसका नाम नोबेल मेमोरियल प्राइज़ है) सन उन्नीस सौ में फाउंडेशन की स्थापना हुई और 1901 में प्रथम नोबेल पुरस्कार घोषित किए गए. नोबेल की वसीयत को लेकर रिश्तेदारों ने विवाद खड़े किए, पर वह सब गौण हैं. महत्वपूर्ण यह है कि कैसे एक हथियार कारोबारी ने एक सुविचारित निर्णय से अपनी मौत के बाद दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया और निरंतर बदल रहा है- सकारात्मक रूप से.
 


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