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नया हरियाणा

बुधवार, 21 नवंबर 2018

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भारत की एकता और अखंडता के प्रतीक लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल

ऊंचाई पर भारत के 'सरदार' की प्रतिमा 7 किलोमीटर से दिखाई देती है.

The Iron Man Sardar Vallabh Bhai Patel, the symbol of India's unity and integrity,, naya haryana, नया हरियाणा

31 अक्टूबर 2018

धर्मेंद्र कंवारी, हरिभूमि रोहतक, 9996548479

31 अक्टूबर 2018 यानी आज गुजरात के सरदार सरोवर बांध के समीप दुनिया की सबसे ऊंची 182 मीटर सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों होगा। प्रतिमा के अनावरण के साथ ही भारत में पर्यटन के लिहाज से एक और बड़े स्थान की तरफ दुनिया का ध्यान आकर्षित होगा वहीं भारतीय स्वतंत्रता इतिहास के इस अमिट पुरुष का नाम विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा के साथ दुनिया में अमर हो जाएगा। विश्वस्तरीय पर्यटन सुविधाओं के साथ दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा तक पर्यटकों को लाने के लिए जमीनी, हवाई और पानी के सभी रास्तों का इस्तेमाल होगा। प्रतिमा के बनने की कहानी जानने के लिए हरिभूमि के समाचार संपादक धर्मेंद्र कंवारी सीधे स्टेच्यू आफ यूनिटी तक पहुंचे और चार दिन तक प्रतिमा निर्माण के हर उस पहलू की जानकारी ली जो आपके लिए जानना जरूरी है। तो आए चलते हैं गुजरात के सरदार सरोवर बांध पर मौजूृद दुनिया के की सबसे बड़ी प्रतिमा स्टेच्यू आफ यूनिटी के रूप में अनावरण से पहले ही विख्यात हो चुकी है इसके साथ ही करें बडोदरा जैसे खूबसूरत शहर को भी एक पत्रकार की नजर से। 

सुबह के साढे आठ बजे थे जब नई दिल्ली से रवाना होकर पश्चिम एक्सप्रेस ने यात्रियों समेत मैं और मेरे तीन अन्य साथियों के दल को बड़ोदरा के रेलवे स्टेशन पर उतारा। बाहर निकलते ही टैक्सी वाले ज्यों ही हमारी तरफ तरफ लपके तभी मैंने एक को कहा, “मुझे स्टेच्यू आफ यूनिटी पर जाना है, चलेंगे‍ आप?” 

वो गुजराती ही था लेकिन हिंदी भी बहुत अच्छी थी, एक बड़ी सी मुस्कान के साथ कहा, “जरूर, मैं नहीं आपको कोई और लेकर जाएगा लेकिन पहले आप बड़ोदरा को तो देख लें। बहुत थके होंगे पहले होटल जाकर फ्रेश हो लें फिर आपको टैक्सी वाला वहां लेकर जाएगा।” ये वो पहली झलक थी जो बडोदारा के टैक्सी वालों से लेकर होटल वालों तक चेहरे पर मुस्कान रही थी क्योंकि अब उनको यकीन था कि लोग सरदार पटेल से मिलने को बेताब हैं। यानी स्टेच्यू आफ यूनिटी से उनका भविष्य बदलने वाला है।
खैर, हमारा होटल पहले से ही रेलवे स्टेशन से वॉकिंग डिस्टेंश पर ही बुक था इसलिए बदले में एक बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ हम अपने रास्ते पर बढ़ चले। होटल पहुंचकर रिस्पेशन पर फिर अपना वही सवाल पूछा, “स्टेच्यू आॅफ यूनिटी कैसे जाएंगे? ” वहां भी एक बड़ी सी मुस्कान के साथ रिस्पेशनिस्ट ने कहा, आजकल हमारे होटल में स्टेच्यू आॅफ यूनिटी तक जाने वाले लोग ही ज्यादा आ रहे हैं, आप चिंता ना करें, पहले आफ चेक इन कर लें, थोडा आराम करें, उसके बाद हम आपको ट्रैवर्ल्स की एक लिस्ट मुहैया करवा देंगे, आप अपने स्तर पर बुकिंग कर लें। होटल में चेक इन के बाद शावर और बाद में कंपलीमेंटरी स्वादिष्ट नाश्ते के बाद हम स्टेच्यू आफ यूनिटी पर जाने बेहद उत्सुक थे। 
हैलो, हम चार लोग हैं, स्टेच्यू आफ यूनिटी जाना है, आप कितने रुपये चार्ज करेंगे-रूम से ही एक ट्रैव्लर्स के पास कॉल की गई। सामने से एक गुजराती को बहुत ही प्यार से सावधानीपूवर्क हिंदी में बात करते सुनकर अलग ही सुकून मिला। तीन टैक्सी वालों से बात करने के बाद एक को स्टेच्यू आफ यूनिटी पर चलने के लिए बुला लिया गया। पंद्रह मिनट बाद ही होटल की रिस्पेशन से सूचना मिली की विपुल पटेल अपनी शानदार इनोवा के साथ हमें ले चलने तैयार था।
गाडी में बैठते ही विपुल ने सीट बैल्ट कसते हुए कहा, “साहब पिछले कई महीनों से स्टेच्यू आफ यूनिटी लगातार आना जाना हो रहा है। आप आराम से बैठें, दो घंटे बाद हम केवडिया पहुंच जाएंगे और आप इत्मीनान से स्टेच्यू अाफ यूनिटी देख लेना । वापसी में मैं आपको कुछ और अच्छी जगह भी दिखा दूंगा। ” (ये वो गुजराती बिजनेस का नजरिया था जो टूरिस्ट को न केवल स्टेच्यू आफ यूनिटी दिखाने के लिए बेताब है बल्कि दूसरी जगहों को भी लोकप्रिय करना चाहता है। 20 मिनट शहर की खुली सड़कों पर अपनी इनोवा को दौड़ाने के बाद विपुल ने एक नई बन रही फोरलेन पर चढ़ाया और खुद ही अपनी तरफ से जानकारी दी, 31 तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्टेच्यू आफ यूनिटी का उद्घाटन करने आ रहे हैं, उससे पहले ये फोर लेन तैयार होना है। यहां रात-दिन काम चल रहा है अौर लग रहा है कि 31 तक इसे हर हाल में पूरा कर ही देंगे।
विपुल का कहना भी सही था, हर जगह रास्ते में फोरलेन पर काम चल रहा था। कहीं बीच में डिवाइडर पर पौधे लग रहे थे तो कहीं सडक कटाव को रोकने लिए मिट्टी डाली जा रही थी। स्टेट रोड था इसलिए कहीं भी टोल नहीं चुकाना होता है। रास्ते में सड़क किनारे केले और कपास के लहलहाते खेत थे, जो राह चलते किसी को भी लुभा लेते हैं। बीच-बीच में निर्माण जारी थे, कहीं गुजारती ढाबे बन रहे थे तो कहीं होटल, जो निश्चित तौर पर स्टेच्यू अाफ यूनिटी को लेकर स्थानीय तैयारियां थी जो पर्यटकों के लिहाज से बनाई जा रही थी।
मैंने टाइम पास करने के लिहाज से विपुल से पूछा-यहां जमीन मिल जाएगी क्या? विपुल ने हल्की हंसी के साथ मिरर में मुझे देखते हुए कहा, “थोड़ा पहले बताना था साहब, अब यहां जमीन नहीं मिलनी है क्योंकि लोग पहले ही खरीद सकते थे उन्होंने खरीद ली और जो बेचना चाहते थे उन्होंने बेच दी। दो तीन साल बाद देखना आप यहां कितने लोग आएंगे। स्टेच्यू आफ यूनिटी का अलग ही क्रेज बनेगा।”
करीब दो घंटे के सफर के बाद हमें सड़क पर सुरक्षाकर्मी नजर आए और विपुल ने बताया कि यहां से हमें पास लेना होगा उसके बाद ही अंदर जा पाएंगे। एक साथी ने पास की औपचारिकताएं पूरी की तब तक मैं गाडी से उतरकर पास स्थल का निरीक्षण करने लगा जो कभी रेस्ट हाउस रहा होगा। वहां पर बाहर दो स्टेच्यू लगे थे, एक सरदार वल्लभ भाई पटेल का और दूसरा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का। अंदर घुसने पर देखा कि वो आधारशिला बोर्ड भी वहां रखा हुआ था जो गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने स्टेच्यू आफ यूनिटी के लिए किया था। 31 अक्टूबर 2013 के इस शिलान्यास बोर्ड से जानकारी मिलती है कि विश्व की सबसे बडी प्रतिमा स्टेच्यू आफ यूिनटी की आधारशिला मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की 138वें जन्मदिवस पर रखी। ये जानकारी वहां अंग्रेजी के साथ अन्य पांच भाषाओं में भी अंकित थी। मुझे बोर्ड पढते देख वहां मौजूद एक शख्स ने बताया कि यहां ये अस्थाई रूप से रखा हुआ है, स्टेच्यू आफ यूनिटी तैयार होने के बाद वहां रखा जाएगा। 
खैर, एंट्री पास लेने के बाद मैं ज्यों ही इनोवा की तरफ बढा तो दूर से एक महामानव रूपी प्रतिमा सिर पहाड़ों के बीच से दिखाई दिया तो रोमांच से भर गया। मैंने विपुल से पूछा तो उसने बताया कि हम अभी आठ किलोमीटर की दूरी पर हैं और यहां से स्टेच्यू आफ यूनिटी की प्रतिमा दिखाई देने लगती है। विपुल पटेल की इनोवा हमें लेकर स्टेच्यू आफ यूनिटी की तरफ बढी और रोमांच और प्रतिमा को देखने का कौतूहल अपने आप ही बढ़ने लगा। प्रतिमा ज्यों ज्यों नजदीक आ रही थी, निर्माण कार्य और मजदूरों की संख्या भी बढती जा रही थी। प्रतिमा से करीब दो किलोमीटर दूरी पर हमने जानकारी लेने के लिहाज से निर्माण कंपनी एलएंडटी के आफिस से दो जनसंपर्क अधिकारियों को अपने साथ लिया और प्रतिमा की तरफ पैदल ही बढ चले। सबसे पहले हम सभी को पहने ही रखने की हिदायत के साथ हेल्मेट दिए गए, जिन्हें हमने तुरंत ही पहन लिया। ऐसा वहां चल रहे निर्माण कार्यों को देखते हुए जरूरी भी था।
प्रतिमा से करीबन पांच सौ मीटर पहले ही एक बड़ा सा भवन बनता हुआ दिखाई दिया तो एक पीआओ संजय तिवारी ने बताया,“ये श्रेष्ठ भारत भवन बनाया जा रहा है, यहां थ्री स्टार होटल की सुविधाएं मिलेंगी, इसमें 52 कमरे होंगे और यहां सिर्फ पटर्यक रूकेंगे। इसके बाद पर्यटक सबसे पहले प्रतिमा से ठीक पहले बने टिकट घर पहुंचेंगे और यहां से सभी की डिजिटल एंट्री होगी। इसके साथ ही फूड कोर्ट बनाया जा रहा है जहां एक बार में पांचसौ लोग रिफ्रेशमेंट ले सकते हैं। रिफ्रेशमेंट के बाद सीधे स्टेच्यू आफ यूनिटी की तरफ चलने के लिए एक शानदार रास्ता बनाया गया है, साथ ही स्टेच्यू आफ यूनिटी तक पहुंचने के लिए एलिवेटर भी लगाया गया है। जो पैदल ना चलना चाहे उन्हें आसानी रहेगी।”
उनके जानकारी देने के साथ-साथ मैं अपनी गर्दन को पूरी ताकत के साथ पीछे की तरफ घुमाकर स्टेच्यू आफ यूनिटी को निहार रहा था और मुझे ऐसा करते देख एलएंडटी के इंजीनियर एमवी राव खुद ही मेरे पास आ गए और बोले, “आप पहले आराम से प्रतिमा को देखें, यहां आने वाला हर शख्स कुछ देर ऐसे ही करता है। इसके बनने के बाद मैं खुद बच्चों को यहां लेकर आने वाला हूं। विश्व की सबसे बडी प्रतिमा के साथ जुडने पर मुझे जिस तरह गर्व महसूस होता है उसी तरह यहां आने वाले हर शख्स को प्रतिमा को देखकर भी गर्व होता है तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्टेच्यू आफ यूनिटी बनाई है।” सच में ही एम वी राव का कहना बिल्कुल सही था। सामने बांध के गेट नजर आ रहे थे और डेम की ऊंचाई से कहीं बडी स्टेच्यू आफ यूनिटी की सरदार वल्लभ भाई पटेल की तांबे की प्रतिमा ऐसे लग रही थी जैसे कोई महामानव वहां खड़ा होकर सबकुछ देख पा रहा था। 
एम वी राव ने कहा, “ये तो आप जानते ही होंगे कि देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल को समर्पित दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी” का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 अक्टूबर को उनके जन्म दिवस पर करेंगे। दुनिया की सबसे बड़ी इस प्रतिमा की ऊंचाई 182 मीटर यानी 600 फुट है और ये सरदार सरोवर बांध से तीन किलोमीटर की दूरी पर बनाई गई है। पूरी तरह से लोहे की बनी लौह पुरुष की इस प्रतिमा का बाहरी आवरण तांबे का बना है। प्रतिमा के लिए लोहा देशभर के किसानों-मजदूरों से एकत्रित किया गया है।” पेशे से इंजीनियर पर अब एक गाइड की भूमिका में एमवी राव ने स्टेच्यू आफ यूनिटी से जुड़ी हर बारीक जानकारी जुटा ली है और एक पेशेवर गाइड की तरह ही वो मुझे इससे अवगत करवा रहे थे। 
अपनी दी गई जानकारी के बावजूद मेरे चेहरे पर जिज्ञासा के भाव देख एम वी राव ने बोलना जारी रखा, “प्रतिमा की कुल ऊंचाई 182 मीटर है। ये दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। इसे बाद दुनिया की दूसरी सबसे बडी प्रतिमा चीन में स्रिंपग टेम्पल बुद्ध 153 मीटर है। तीसरे नंबर पर जापान की उशीकु दाइबुल्सु 120 मीटर, चौथे नंबर पर अमेरिका की स्टेच्यू आफ लिबर्टी 93 मीटर, पांचवे नंबर पर रूस की द मदरलेंड कोल्स 85 मीटर और ब्राजील की क्रादस्ट द रीडीमर 39.6 मीटर लंबी है। हमारी स्टेच्यू आफ यूनिटी दुनिया का रिकॉर्ड हमेशा इसी के नाम रहने की उम्मीद है।”
मूलत: आंध्र प्रदेश के रहने वाले एमवी राव को थोडा आराम देने के लिहाज से अब जनसंपर्क अधिकारी संजय तिवारी ने बोलना शुरू किया, “इस 31 अक्टूबर तक केवल प्रवेश स्थल, फूड कोर्ट, एक्सीलेटर, प्रतिमा, प्रतिमा के दिल तक जाने के लिए लिफ्ट का ही काम पूरा होगा, इसके बाद आगामी महीनों में बाकी बचे काम को पूरा कर लिया जाएगा। प्रतिमा का निर्माण साधु बेट पर किया गया है। प्रतिमा का निर्माण क्षेत्र 19000 वर्ग मीटर है और क्षेत्र में इससे पर्यटन का विकास होगा।”
अब एमवी राव हमें जानकारी देने के लिए आगे बढ़ते हुए बोलते हैं,“ आप ये जो प्रतिमा देख पा रहे हैं इसमें 70 हजार टन सीमेंट, 18500 टन रीइनफोर्समेंट स्टील, 6000 टन स्ट्रक्चर स्टील का इस्तेमाल किया गया है। प्रतिमा के बाहरी आवरण में कुल 5050 ब्लॉक लगाए गए हैं और पिछले चार साल से करीबन पांच हजार मजदूर यहां काम कर रहे हैं। प्रतिमा में लगाए एक धातु का ब्लॉक छोटे से छोटा एक मीटर का है और बड़े से बड़ा 10 मीटर का है।”
आपको यहां बताना जरूरी होगा कि स्टेच्यू आफ यूनिटी के स्वरूप और इसके निर्माण की कहानी भी बहुत अनोखी है। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण में पांच साल (60 महीने) का वक्त लगा है। ये सबसे कम समय में बनने वाली यह दुनिया की पहली प्रतिमा है। प्रतिमा का निर्माण भूकंपरोधी तकनीक से किया गया है। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि 6.5 की तीव्रता का भूकंप और 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाओं का भी इस पर कोई असर नहीं होगा। मैंने पूछा, जो लोहा पूरे देश से इक्ट्ठा किया गया था उसका क्या हुआ? इस पर राव ने कहा कि वह दूसरे सभी निर्माण कार्यों में इस्तेमाल हो रहा है। 
इस प्रतिमा को बनाने वाले शिल्पकार पद्मश्री राम सुथार और उनके बेटे अनिल सुथार का भी बड़ा योगदान है। राम सुथार के अनुसार, “मोदीजी को सरदार की सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने का विचार आया। इस काम के लिए अमेरिकन आर्किटेक्ट माइकल ग्रेस और टनल एसोसिएट्स कंपनी को भी हायर किया गया। उन्होंने बहुत सारी जानकारियां ली। माइकल ग्रेस ने भारत में सरदार पटेल की सभी मूर्तियों को देखा और उनके बारे में विस्तार से सूक्ष्म से सूक्ष्म जानकारी जुटाई। रिसर्च के बाद बताया कि सरदार पटेल के व्यक्तित्व, चाल, कपड़ों और हावभाव वाली सबसे सटीक मूर्ति अहमदाबाद एयरपोर्ट पर लगी है। उन्होंने सरकार को यह जानकारी दी कि यह मूर्ति हमने बनाई है। इसके बाद सरकार की तरफ से हमें फोन आया कि सरदार पटेल की एयरपोर्ट पर बनी प्रतिमा उनको पसंद आई है।
उन्होंने हमसे पूछा कि क्या हम फोटोग्राफ या फिर प्रतिमा का उपयोग कर सकते हैं? इसके बाद मैंने जवाब दिया कि अगर आपको सरदार की प्रतिमा चाहिए तो मैं देने को तैयार हूं। इसके बाद जब भूमि पूजन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी आए तो बताया गया कि सरदार पटेल की मेरी बनाई गई प्रतिमा का चयन किया है। टेंडर मिलने के बाद निर्माण क्षेत्र की कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) ने हमसे संपर्क किया और फिर हम भी इस प्रोजेक्ट के साथ जुड़ गए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये था कि सरदार पटेल की इस प्रतिमा का चेहरा कैसा हो? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट ने एक कमेटी का गठन किया। कमेटी में सात से दस लोग थे। सबसे अलग-अलग विचार थे। कुछ का कहना था कि फोटो में जैसे दिखते हैं वैसे ही कपड़े होने चाहिए। कुछ का कहना था कि परिवार के लोगों से पूछा जाना चाहिए। अलग-अलग मत व सुझाव थे।
इसके बाद एलएंडटी ने थ्री डी चेहरा बनाया। उसके बाद हमने तीस फीट का चेहरा बनाकर दिखाया। इसके बाद कमेटी के सदस्य हमारे दिल्ली के ऑफिस में आए और सरदार के चेहरे को अप्रूव किया गया। एलएंडटी की सूचना पर हमने कांसे का चेहरा बनाकर भी उनको दिखाया था। इसके बाद एक कास्टिंग कंपनी को सरदार का चेहरा भेजा गया। उन्होंने वहां थर्माकोल की प्रतिमा बनाने का काम शुरू किया। इसके बाद हमें चीन जाकर काम देखने को कहा गया। हमने वहां देखा कि सरदार की प्रतिमा भी बुद्ध के जैसी लग रही थी। हमने कहा कि हमें सरदार की प्रतिमा वैसी चाहिए जैसा लोगों ने उन्हें देखा है। इसके बाद 2 गुणा 2 मीटर के टुकड़े बनाकर कास्टिंग शुरू की गई और आज नतीजा आपके सामने है।”
शिल्पाकर राम सुथार प्रतिमा निर्माण के दौरान भी लगातार यहां आते रहे हैं। काफी इंजीनियर के माेबाइल में उनके साथ लिए गए फोटो भी हैं। बुजुर्ग होने के बावजृूद निर्माण स्थल पर उनकी सक्रियता सबको प्रेरणा से भर देती थी।
बातचीत के दौरान ही शाम के सात बज गए थे और प्रतिमा के ठीक पीछे लालिमा के साथ सूरज को डूबता देखना अपने आप में अनोखा और अद्भुत अनुभव था। दूसरे साथी डॉक्यूमेंट्री के लिए इस नजारे को शूट कर रहे थे और मैं लेख के लिहाज से जानकारी जुटा रहा था। इतना सब कुछ सुनने के बावजूद मेरी जिज्ञासाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। मैंने इंजीनियर एमवी राव से पूछा, क्या हम अब प्रतिमा के पास जाकर बाकी चीजें देखें तो उन्होंने मजबूरी बताते हुए कहा कि, माफी के साथ कहना चाहता हूं आज हम आपको वहां नहीं ले जा सकते हैं। निर्माण चालू है, नाइट शिफ्ट में भी काम चलेगा और अब अंधेरा भी हो चुका है इसलिए आगे जाने की अनुमति नहीं है। सुरक्षा के लिहाज से आपको वहां जाने की अनुमति नहीं मिल सकती है। खैर, हम सबने तय किया कि कल सुबह सात बजे ही फिर से स्टैच्यू आफ यूनिटी पर पहुंचा जाए और बाकी जानकारी जुटाई जाए। 
बस चलते-चलते मैंने पूछा कि अंधेरा होने पर पर्यटकों को प्रतिमा कैसी दिखाई देगी तो उन्होंने कहा, “ये विश्व की सबसे बडी प्रतिमा है तो यहां सबकुछ विश्व स्तरीय जुटाया गया है। प्रतिमा को भूगोलिक दृष्टि से इस तरह स्थापित किया है कि सूरज की यहां पहली रोशनी से लेकर शाम ढलते हुए आखिरी रोशनी तक स्टेच्यू आफ यूनिटी पर ही पड़े। रात की लाइटिंग ऐसी होगी जिसको देखना भी अपने आप में ही एक अलग तरह का अनुभव होगा। स्टेचू ऑफ यूनिटी के चारों ओर अदभुत लाइटिंग होगी। इसके लिए दुबई के शारजाह की एक कंपनी कंपनी लाइट लगा रही है। 182 मीटर ऊंची प्रतिमा को लाइट से रोशन करने के लिए लेजर लाइट का इस्तेमाल होगा। केवड़िया से स्टेचू ऑफ यूनिटी तक जाने वाले रास्ते को भी लाइटों से सजाया जाएगा। स्टेचू के चारों ओर 3 टावर खड़े किए जाएंगे। जिसमें एक खंभे पर 24 व्हाइट फ्रेजर जबकि दूसरे पर 50 से अधिक लाइटें लगेंगी। एक लाइट 1000 वॉट की होगी। पर्यटक रात में स्टेचू ऑफ यूनिटी को अच्छी तरह से देख सकें इसलिए 182 मीटर तक लेजर लाइट लगाई जाएगी।”
शाम बहुत हो चुकी थी इसलिए कल फिर मिलने के बाद वादे के साथ हमने वहां से विदा ली। स्टेच्यू आफ यूनिटी पर बिताए कुछ घंटे, दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा के साथ अपने कुछ फोटोग्राफ और वहां देश के करीबन हर भाग से आए इंजीनियर्स व मजदूरों से मेल मुलाकातों से भरा हमारा पहला दिन होटल में जाकर थमा और कल फिर से प्रतिमा पर जाने की बेताबी तो साथ थी ही। 
अगले दिन सुबह पांच बजे अपनी इनोवा के साथ ड्राइवर विपुल पटेल फिर से होटल में हाजिर थे और हम ठीक सात बजे प्रतिमा के फिर से सामने थे। सुबह की रोशनी में नहाई स्टेच्यू आफ यूनिटी पर सूर्य की किरण पड़कर उसे एक अलग ही चमक और देखने वालों को अलग ही अनुभव प्रदान कर रही थी। वहां मौजूद इंजीनियर शंकर, दो स्थानीय पत्रकार रफीक और नरेंद्र पेपरवाला के साथ मैंने चर्चा शुरू की। इंजीनियर शंकर बोले, “अभी जो काम आप देख पा रहे हैं, वह पहले चरण का काम है, दूसरा चरण 31 के बाद शुरू होगा। उद्घाटन के साथ ही पर्यटक देश में ही बनी दो हाईपावर लिफ्ट के साथ 32 सेंकड में 132 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गैलरी में लेकर जाएगी। यहां 200 लोग एक साथ सरोवर बांध के अलावा नर्मदा के 17 किमी लंबे तट पर फैली फूलों की घाटी का मनोरम नजारा देख सकेंगे। करीब दो किलोमीटर में फैली फूलों की घाटी में 36 प्रकार के फूल हर मौसम में खिले रहेंगे। स्टेच्यू आफ यूनिटी सरदार सरोवर बांध से डेढ गुणा ऊंचा है। इसकी गैलरी से बांध और तालाब भी दिखाई देंगे।”
स्थानीय पत्रकार रफीक ने बताया, “जिस जगह पर आप अभी प्रतिमा देख रहे हैें, वो केवड़िया क्षेत्र है, पर्यटन के लिहाज से अब केवड़िया दुनियाभर में अपनी जगह बनाने वाला है। सरदार पटेल की प्रतिमा को पर्यटक यहां से ही नहीं नौका विहार करके भी देखेंगे। हमें यहां के अधिकािरयों ने बताया कि अगले चरण में यहां नौका विहार के साथ-साथ सी प्लेन की सुविधा भी मिलेगी। हेलीकॉप्टर सेवा भी मुहैया करवाई जा सकती है क्योंकि पहले से मौजूद तीन हैलीपेड के साथ ही तीन और हेलीपैड बनाए जा रहे हैं।”
अब इंजीनियर शंकर ने हमें प्रतिमा के नीचे बने प्रदर्शनी हॉल में ले जाकर बताया , “अब आप प्रतिमा के ठीक नीचे बनाए जा रहे प्रदर्शनी हॉल में हैं। यहां आकर पर्यटक न केवल सरकार वल्लभ भाई पटेल के जीवन से रूबरू होंगे बल्कि तकनीक के साथ उन्हें बहुत सारे दूसरे अनुभव भी करवाए जाएंगे। यहां एक डिजिटल साइनबोर्ड होगा, जिसमें प्रतिमा के निर्माण में लगे हर एक व्यक्ति का बॉयोमीट्रिक ब्यौरा दर्ज होगा। देश व दुनिया के पयर्टक सिर्फ एक क्लिक पर यह जान सकेंगे कि उनके यहां का कौन इंसान प्रतिमा निर्माण में सहयोगी रहा। जैसे अगर आप पंजाब लिखेंगे तो पंजाब के सारे नाम फोटो व डटेल के साथ स्क्रीन पर हेांगे। इसके साथ ही यहां मेकिंग आफ स्टेच्यू नाम से एक फिल्म भी दिखाई जाएगी जिसमें ये जानकारी होगी कि दुनिया की इस सबसे बड़ी प्रतिमा का निर्माण किस तरह किया गया। ”
जब तक टीम के दूसरे साथी अपने शॉट्स लेने में व्यस्त थे मैंने दूसरी जानकारियां जुटाना जारी रखा तो पता चला कि स्टेचू ऑफ यूनिटी का लोकार्पण करने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सी-प्लेन से नहीं आएंगे, क्योंकि यहां प्लेन उतारने की जगह नहीं है। यहां के तीन नंबर तालाब में बड़े-बड़े मगरमच्छ होने के कारण इस प्रोग्राम को रद्द कर दिया गया है। इससे पहले सी-प्लेन के लिए नर्मदा डैम और गरूडेश्वर के बीच 12 किमी के तालाब को पानी भरने की योजना बनाई गई थी, पर डैम अभी भी 12 मीटर तक खाली है। सी प्लेन के लिए अब अलग से योजना पर काम होगा इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हेलीकॉप्टर से ही यहां पहुंचेंगे।
लिफ्ट का काम जारी हाेने की वजह से हम ऊपर बनी गैलरी में तो नहीं पहुंच पाए लेकिन उसी समय गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उप मुख्यमंत्री नीतिन भाई पटेल का वहां आना हुआ। दोनों 31 अक्टूबर के उद्घाटन समारोह की तैयारियाें और अधिकारियों की मीटिंग के लिए वहां पहुंचे थे। निरीक्षण के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी से बातचीत हुई तो उन्होंने कहा, “स्टेच्यू ऑफ यूनिटी का लोकार्पण करने 31 अक्टूबर को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां पहुंच रहे हैं और उन्होंने ही दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा और राष्ट्रीय एकता की पहचान बनने जा रही है स्टेच्यू आफ यूनिटी का सपना देखा था और अब ये उन्हीं के हाथों पूरा होने वाला है। प्रतिमा के स्टील संरचना का कार्य 20 सितंबर तक पूरा कर लिया गया था और अब वहीं फिनिशिंग का काम चल रहा है। 183 मीटर ऊंची इस प्रतिमा का करीब 95 फीसदी काम अभी तक पूरा हो चुका है। इसके साथ ही यहां पर एकीकृत भारत के निर्माण में सरदार पटेल के योगदान को दर्शाने के लिए करीब 52 कमरों का 'श्रेष्ठ भारत भवन' का भी निर्माण जोरों पर है। यह एक वर्ल्ड क्लास कैंपस होगा। यहां स्वच्छता, सुरक्षा, कैफिटीरिया, फूड कोर्ट के साथ अन्य सुविधाएं भी विश्वस्तरीय होंगी। यहां पर बाकी प्रदेश के भी भवन बनेंगे। उनके लिए यहां भूखंड अलॉट कर दिए गए हैं। हरियाणा, उत्तरप्रदेश और छतीसगढ समेत कई प्रदेश यहां भवन बनाने की सहमति दे चुके हैं।
गुजरात के मुख्यमंत्री के साथ लंबा चौड़ा काफिला नहीं देखकर वीवीआईपी कल्चर खत्म होने की शुरुआत का आभास भी हुआ। हरियाणा में होते तो नजारा कुछ और ही होता, मैंने मन ही मन सोचा। दोपहर तक प्रतिमा निर्माण से जुड़ी करीबन हर जानकारी हमारी पास थी और वक्त हो चला था भोजन का तो पास ही स्थित रेस्ट हाउस में लौट गए। 
भोजन के ठीक बाद कार्यक्रम था उस जगह के भ्रमण का जहां से सरदार वल्लभ भाई पटेल का एक सपना साकार हुआ था और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का होने वाला है। वो जगह है सरदार सरोवर बांध । सरदार सरोवर बांध की यात्रा पर आपको ले चलने से पहले यह जानना भी जरूरी है कि आखिर यहां बांध बनाया क्यों गया और इसके पीछे की क्या कहानी है। पहले जानते हैं नर्मदा नदी के बारे में। नर्मदा नदी भारत की पांचवीं सबसे बड़ी (1312 किमी. लंबी) नदी है। अमरकंटक से निकल कर नर्मदा नदी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं गुजरात होते हुए खंभात की खाड़ी में गिरती है। नर्मदा नदी पर 30 बड़े बांधों का निर्माण किया जा रहा है, जिसमें से एक ‘सरदार सरोवर बांध परियोजना’ भी है। इस परियोजना का शिलान्यास 5 अप्रैल, 1961 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था।
दरअसल यह प्रोजेक्ट देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का सपना था। वो अक्सर कहते थे कि गुजरात का किसान पानी की किल्लत की वजह से अपनी पूरी फसल नही ले पाता है, अगर बांध बनाया जाए तो यहां का किसान खुशहाल हो सकता है। उन्हीं के प्रयासों के चलते यह परियोजना बनी। 
सरदार सरोवर बांध के 30 दरवाजे हैं और प्रत्येक दरवाजे का वजन 450 टन है। हर दरवाजे को बंद करने में करीब एक घंटे का समय लगता है। 138 मीटर ऊंचे सरदार सरोवर बांध की जल भंडारण क्षमता अब 4,25,780 करोड़ लीटर हो चुकी है। ये पानी पहले बह कर समुद्र में चला जाया करता था। 2016-17 के दौरान बांध से 320 करोड़ यूनिट बिजली पैदा की गई। अब ज्यादा पानी जमा होने से 40 फीसदी ज्यादा बिजली पैदा की जा सकती है। सरदार सरोवर डैम से बनी बिजली का 57 फीसदी महाराष्ट्र को, 27 फीसदी मध्य प्रदेश को और 16 फीसदी गुजरात को मिलती है। बांध से गुजरात के हजारों गांवों के साथ महाराष्ट्र के 37, 500 हेक्टेयर इलाके तक सिंचाई की सुविधा मिली और राजस्थान के दो सूखा प्रभावित जिले जालौर और बाड़मेर तक 2,46,000 हेक्टेयर जमीन की प्यास बुझ रही है। गुजरात के 9,633 गांवों तक पीने का पानी पहुंचाया जा रहा है।
1.2 किलोमीटर लंबा बांध 163 मीटर गहरा है। बांध के दो पावर हाउसों बेड पावर हाउस और कैनाल हेड पावर हाउस की क्षमता क्रमशः 1,200 मेगावॉट और 250 मेगावॉट है। पिछले साल के आंकडों के अनुसार सरदार सरोवर बांध से अब तक 16,000 करोड़ से ज्यादा की कमाई हो चुकी है, जो कि इसकी लागत का दो गुना है। डैम का हर एक गेट करीब 450 टन का है और इसे बंद करने में करीब एक घंटे का समय लग जाता है। विस्थापन के मुद्दे को लेकर डैम विवादों में भी रहा लेकिन 17 सितंबर, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के नर्मदा जिले के केवडिया में ‘सरदार सरोवर बांध परियोजना’ का उद्घाटन किया। एक रोचक तथ्य ये भी बताया जाता है कि बांध को बनाने में जितना कंक्रीट लगा है, उससे चांद तक सड़क बनाई जा सकती है। बताया जाता है यह देश का सबसे बड़ा बांध है। अमेरिका के ग्रैंड कौली डैम के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांध है। जिस नदी पर यह बांध बना है वह है नर्मदा।
सरदार सरोवर बांध की यात्रा पर पहला पडाव है हर आंगुतक के पास एंट्री पास होना। इस औपचारिकता के बाद पहला पड़ाव आता है व्यू नंबर एक। इस व्यू के किनारे खड़े होकर जंगल, बांध से गिरता और फिर उछाल लेता पानी ही पानी। पीछे मुडते ही विशाल सरदार पटेल की प्रतिमा और फूलों की बहारें। मेरे साथ मौजूद बड़ोदरा निवासी उदयवीर मिठारवाल ने बताया कि बांध के गेट से गिरता पानी देखने के लिए यही लोग यहां इक्ट्ठा होते हैं। दूर-दूर तक पर्यटक आते हैं और प्रतिमा बनने से पहले ही यहां का मुख्य आकर्षण होता था। इसके बाद आप सड़क मार्ग से ही व्यू नंबर दो पर आते हैं। ये बांध का पानी दूसरी जगह तक पहुंचाने के लिए बनाए टैंक के साथ सटकर ही है। यहां सुकून से बैठकर पानी को देखने के लिए स्थायी व्यवस्था और एकांत है। इसी के साथ ही एक चेतावनी बोर्ड भी लगा है जिस पर लिखा है आप मगरमच्छ से सावधान रहें। तभी मेरी नजर पानी में झांकती दो आंखों पर पड़ी तो इस सावधानी का असली मकसद भी नजर आ गया। सुरक्षाकर्मी चिंतन ने बताया कि यहां लोग लापरवाही बरतते हैं। अभी तक कोई हादसा तो नहीं हुआ है लेकिन फोटो के रोमांच में लोग मगरमच्छों के बेहद नजदीक चले जाते हैं इसलिए चेतावनी बोर्ड लगवाने पड़े और सुरक्षाकर्मी भी खुद इस पर नजर रखते हैं। इसी व्यू प्वाइंट से चंद कदम की दूरी पर एक रास्ता नीचे की तरफ जाता है। वहां झांककर देखा तो सैकड़ों की संख्या में टेंटनुमा निर्माण कार्यों को हाेते देखा जा सकता है। वहीं से गुजर रहे एक दूसरे सुरक्षाकर्मी शिव पटेल ने बताया, “ये टेंट सिटी बन रही है। अब स्टेच्यू आफ यूनिटी बनने के बाद यहां टूरिस्ट बहुत ज्यादा बढने वाले हैं। अभी ये संख्या रोजाना करीब तीन से चार हजार होती है, जब पूरा काम हो जाएगा तो दस हजार तक होने की उम्मीद है। ऐसे में कुछ लोग तो चाहेंगे कि वो इस प्राकृतिक माहौल में कुछ समय या दिन गुजारें तो उनके लिए ये टेंट सिटी बनाई जा रही है। यहां करीबन पांचसौ टेंट में रहने लेकिन प्राकृतिक वातारण की सभी सुविधाएं होगी, ताकि नमृदा की खुबसूरती का सही आनंद यहीं रहकर लिया जा सके। इससे थोडा आगे टरबाइन के पास ही एक छोटी टेंट सिटी और बसेगी।”
दूसरे व्यू प्वाइंट से लौटते समय एक सीधी चढ़ाई पर मौजूद है व्यू प्वाइंट तीन। ये यहां का मुख्य व्यू प्वाइंट है जहां से बांध ठीक सामने है, गिरने के बाद उछाल मारते पानी की बूंदें यहां से सीधे देखने वालों से टकरा जाती हैं। और पीेछे मुड़ते ही विशाल सरदार वल्लभ भाई पटेल की दुनिया की सबसे विशाल प्रतिमा दिखाई देती है। बीच में फूलों की घाटी का अलग ही रोमांच है। यहां पर भी सरदार पटेल की एक छोटी प्रतिमा स्थापित है, जिसका लोकापर्ण लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। यहीं पर बांध निर्माण की पूरी प्रकि्रया को फोटो प्रदर्शनी के माध्यम से दिखाया गया है। इसके ठीक नीचे पहाड़ के कटाव के पास ही छोटी छोटी छप्परनुमा दुकानें हैं जहां आदिवासी लोगों द्वारा उगाए गए भुट्टे, मूंगफली, इमली, चने बेचते हुए करीब पांच-छह लोग हैं। हरियाणा में बड़ी उम्र के लोगों को सम्मान व संबोधन के लिए ताऊ या ताई शब्द का इस्तेमाल होता है। गुजरात में इसके लिए भाई और महिला के लिए मौसी शब्द का इस्तेमाल होत है। मैंने वहां दुकान पर मौजूद एक बुजुर्ग महिला से पूछा, “आप कब से यहां हैं, अपने बारे में कुछ बताएं।” पास ही पड़ी कुर्सी को झाड़ते हुए उन्होंने बताया कि उनका नाम मंगला है और सभी उसे यहां मंगला मौसी कहते हैं क्योंकि वो बांध बनने के बाद नहीं बांध शुरू होने के बाद ही यहां आई थी। मंगला मौसी ने बताया, “मेरी तब शादी हुई ही थी कि यहां मैं अपने पति के साथ मध्यप्रदेश से बांध निर्माण के मजदूर के रूप में यहां आई थी। 11 रुपये दैनिक मजदूरी ओर ओवरटाइम के 4 रुपये के साथ दोनों 32 रुपये कमाते थे। जब तक बांध का काम चला हमारी मजदूरी चली। बच्चे भी तीन यहीं पर हुए और एक कामचलाऊ टीन की शेड वाला एक कमरे का घर भी निर्माण कंपनी जेपी के पक्के मकानों के साथ ही बना लिया। बांध बनने के बाद भी यहीं पर रहे और यहां देखने आने वाले लोगों को ये स्थानीय उत्पाद बेचने शुरू किए। इससे दो पैसे उनके बन जाते हैं और दो पैसे मेरे। 100-150 रुपये आराम से कमा लेती हूं और इतना ही काफी है। ” मंगला मौसी ने जिस सुकून व आत्मीयता से ये बातें कहीं वो यह बताने के लिए काफी था कि जंगल इंसान को बहुत कुछ सिखाता है।
अब तो सरदार पटेल की दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा यहां बन चुकी है, अब तो ज्यादा लोग आएंगे और आप यहां ज्यादा कमा लेंगे, मैंने कहा।
इस पर मौसी ठहाका मारकर हंसी और कहा, “हां ये तो सही है पर मौसी के कमाने के दिन अब कहां रहे? बुढापा गुजर जाए बस इतना ही काफी। सुना है यहां की दुकानों के भी अब टेंडर छोडे गए हैं, हमें कौन रहने देगा यहां।(यहां से उजड़ने की आशंका में उनकी आंखें भीग गई।)”

मंगला मौसी से भुट्ठे खरीदकर खा रहे अहमदाबाद के अनुज ने कहा, “मैं बहुत दिनों से डैम देखना चाहता था लेकिन चार साल से सुना


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