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नया हरियाणा

बुधवार, 21 नवंबर 2018

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हरियाणा सरकार ने रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल का निकाला तोड़

सोशल मीडिया पर सरकार और कर्मचारी दोनों को मिल रहा है समर्थन.

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27 अक्टूबर 2018

नया हरियाणा

हरियाणा सरकार ने रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल के आगे न झुकने का मन बना लिया है। रोडवेज की हड़ताल 11 दिन चलने के बावजूद सरकार किलोमीटर स्कीम के तहत बसें लाने के निर्णय पर कायम है। राजनीतिक तौर पर दो बार वार्ताएँ सरकार की ओर से कर्मचारियों के साथ की गईं, दोनों ही विफल रही। अब सरकार ज्यादा झुकने की बजाय कूटनीतिक तरीके से कर्मचारियों की हड़ताल को बेअसर करेगी। सरकार ने डिपो में खड़ी सभी बसें चलाने का प्लान तैयार कर लिया है।

आउटसोर्सिंग पर 1400 ड्राइवर-कंडक्टर भर्ती कर और डिपो स्तर पर दिहाड़ी के हिसाब से भी नियुक्तियां कर जल्द ही बसों को सड़कों पर उतारेगी। सरकार का मुख्य फोकस अभी हरियाणा और दिल्ली-चंडीगढ़ के बीच बस सेवा सुचारु करना है। सभी 3900 बसों को एक बार सड़क पर उतरने के बाद लंबे रूट की सेवाएं बहाल की जाएंगी। लंबे रूट पर सरकार प्रोबेशन पर कार्यरत पक्के ड्राइवर-कंडक्टर को भेजने की तैयारी कर रही है। इन्हें पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में लंबे रूट पर सेवा देने का अनुभव हो चुका है। नए नियुक्त कर्मचारियों और अन्य विभागों के लिए ड्राइवरों को लंबे रूट पर नहीं भेजा जाएगा। हड़ताली कर्मचारियों को सरकार साफ कह चुकी है कि जिन 510 बसों को लाने का टेंडर और एग्रीमेंट हो चुका है, उन्हें आने से रोकने का सवाल ही नहीं होता। जिन 190 बसों का टेंडर होना है, सरकार उस पर ही पुनर्विचार सकती है।

रोडवेज के समर्थन में अब वीवीआईपी और वीआईपी कोठियों पर लगा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का स्टाफ भी उतर आया है। पीडब्ल्यूडी बीएंडआर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी यूनियन के प्रधान तारा दत्त ने बताया कि बैठक के दौरान कर्मचारियों ने कर्मियों की हड़ताल को समर्थन देने का निर्णय लिया है।

सोशल मीडिया पर हो रहा है वायरल

मनोहर सरकार और रोडवेज कर्मचारियों की हड़ताल में ये शब्द सबसे ज्यादा सुनाई पड़ रहा है. जनता का हित. जानते हैं आखिर क्या है जनता का हित?

अभी तक पढ़ी गई खबरों के मुताबिक यह समझ आता है कि रोडवेज के कर्मचारी सरकार को जनता के हित में काम करने से रोक रहे हैं. जनता के टैक्स का पैसा जनता की सेवा के लिए होता. सो उस पर पहला हक भी जनता का ही बनता है. उसके बाद कर्मचारी हित और सबसे अंत में सरकार का हित होता है.

कर्मचारी इस क्रम को उलटकर कर्मचारियों के हितों को पहले नंबर पर रखवाना चाहते हैं. जबकि ये सेलेक्टिड(कर्मचारी) और इलेक्टिड(नेता) दोनों ही जनता की सेवा के लिए हैं. अगर इस नीति से जनता का करीब 150 करोड़ टैक्स का रुपया बचता है तो यह जनता के हित में कदम है. परंतु कर्मचारी चाहते हैं कि ये पैसा कर्मचारियों के बीच में बांट लिया जाए. 

ऐसे में जनता को तय करना है कि वो 70 हजार कर्मचारियों के साथ हैं या हरियाणा की 2.50 करोड़ जनता के साथ खड़े हैं. लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक होती है, कर्मचारी और नेता तो सेवक भर होते हैं. परंतु कर्मचारी खुद को भगवान समझने लगे हैं. जनता ये पाप कभी होने नहीं देगी.


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