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नया हरियाणा

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

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जानिए सोशल मीडिया और मीडिया में छाए MeToo को

इसके पक्ष और विपक्ष दोनों पहलुओं पर विमर्श होना आवश्यक है.

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11 अक्टूबर 2018

डॉ. पूनम शर्मा

#MeToo यौन उत्पीड़न और यौन हमले के खिलाफ एक आंदोलन है जो सोशल मीडिया जैसे सशक्त माध्यम पर हैशटैग के रूप में वायरल हो रहा है. इससे पहले भी यौन उत्पीड़न की कई कहानियों को सांझा करने के लिए कई हैशटैग #MeToo से पहले उपयोग में लाए जा चुके हैं. किन्तु #MeToo को पहली बार एक अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता और सामुदायिक आयोजक ताराना बर्क ने 2006 के शुरूआत में उपयोग किया. इसके बाद अक्टूबर 2017 में, हार्वी वाइंस्टीन पर यौन दुर्व्यवहार के आरोपों का मामला सोशल मीडिया पर मुखर रूप से उजागर हुआ. इस वाक्यांश को बाद में 2017 में ट्विटर पर अमेरिकी अभिनेत्री एलिसा मिलाने द्वारा लोकप्रिय किया गया. जिसके चलते हॉलीवुड की कई अभिनेत्रियों ने फ़िल्म निर्माता हार्वी वाइंस्टीन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं. एलिसा मिलाने ने यौन उत्पीड़िता को अपनी इस कहानी को सांझा करने के लिए न केवल प्रोत्साहित किया अपितु उसके माध्यम से अन्य यौन उत्पीड़िताओं को भी अपनी बात मुखरता के साथ प्रस्तुत करने का मंच मुहैया कराया. अभिनेत्री एलिसा मिलाने ने यौन उत्पीड़न की शिकार हुई महिलाओं से यह अपील भी की है कि वह खुलकर सामने आकर इस मुहिम का हिस्सा बनें. वाइंस्टीन के मामले ने हॉलीवुड की कई डरा देने वाली प्रथाओं पर रोशनी डाली है, जिसके चलते दुनिया के हर कोनों की, हर समाज की और हर क्षेत्र से जुड़ी महिलाओं ने अब इस विषय को लेकर अपनी चुप्पी तोड़नी शुरू कर दी है.
2006 में ताराना बर्क द्वारा उपयोग किए जाने वाले #MeToo का मूल उद्देश्य सहानुभूति था. विशेष रूप से युवा और कमजोर महिलाओं के माध्यम से कामकाजी महिलाओं को अधिक सशक्त बनाना था। अक्टूबर 2017 में, एलिसा मिलाने ने इस घटना को हैशटैग के रूप में यौन उत्पीड़न और हमले के साथ समस्याओं की सीमा को प्रकट करने के रूप में प्रयोग किया ताकि यह दिखाया जा सके कि कितने लोगों ने इस तरह की घिनौनी घटनाओं को अनुभव किया है. धीरे-धीरे यह आंदोलन अनेक भाषाओं में फैल गया. नतीजतन, यह अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग चीजों का मतलब बन गया. ताराना बर्क ने स्वंय को इस आंदोलन का नेता व निर्माता स्वीकार करते हुए कहा है कि इस आंदोलन में सभी रंगों और उम्र के पुरुष एवमं महिलाएँ दोनों शामिल हैं. क्योंकि यह हाशिए वाले समुदायों में हाशिए वाले लोगों का समर्थन जारी रखता है. व्यक्तिगत प्रतिबिंब और भविष्य की कार्रवाई के माध्यम से संस्कृति को बदलने के उद्देश्य से पुरुषों द्वारा भी कई आंदोलन चलाएं गए हैं जैसे-#IDidThat,#IHave. बर्क ने कहा कि #MeToo ने यह घोषित किया है कि यौन हिंसा पीड़ित अकेले नहीं हैं और उन्हें शर्मिंदा नहीं होना चाहिए।

दिल्ली विश्वविद्यालय के अरविंदो कॉलेज के प्रो. गिरिश चंद्र जोशी के अनुसार- #मी #टू (#मैं #भी #शोषित #हूं/#शिकार #हूँ ) हमारे भद्र-लोक की एक बेहद नंगी सच्चाई है। निःसंदेह, ऐसी घटनाओं-प्रसंगों का भण्डाफोड़ होना चाहिए----चाहे उनमें कोई भी शख्सियत शामिल हो। और हमें "मी टू" कैंपेन में पोल खोलने वाले की हौसलाअफजाई भी करनी चाहिए । लेकिन इस मुहिम का इस्तेमाल किसी को बदनाम करने, लांछन-प्रतिकार की भावना , यूँ ही निशाना बनाने के लिए अथवा सुर्खियाँ बटोरने के लिए भी नहीं होना चाहिए । क्योंकि किसी के भी कैरेक्टर(चरित्र) की हत्या उसकी हत्या से ज्यादा खतरनाक चीज है । हत्या में तो कोई शख्स एकबारगी में ही मर जाता है किंतु चरित्र-हत्या में तो वो अपने व अपनों तथा पूरे समाज की नजरों में हर वक्त घुट-घुटकर मरकर ही जीने को विवश होता है और कई बार तो आत्महत्या जैसे विध्वंशक कदम तक उठा बैठता है। 
अस्तु , सबसे सही-सटीक तो यह है कि जब ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं तभी शोषित-पीड़ित या शिकार को उसकी(शिकारी की) पोल खोलनी चाहिए और समाज को पीड़ित-पक्ष संग खड़ा होकर उसकी हिम्मत की दाद देनी चाहिए । मगर तब अगर कुछ किंतु-परंतु , हिचक-डर अथवा अन्य कोई और मजबूरियाँ रही थी तो फिर महिनों-सालों बाद खुली उस घटना अथवा प्रसंग का पूरा पोस्टमार्टम होना चाहिए ना कि केवल आरोपी की कही-बात को पूरा-सच मानकर, आरोपित को कटघरे में खड़ा कर देना ।
वैसे , इस पहलू का एक दुःखद-प्रकरण यह भी देखने-सुनने में आता है कि अपना कोई काम-मतलब या महत्वाकांक्षा आदि के चलते कई बार कुछ लडकियाँ-महिलाएँ भी पुरुषों पर डोरे डालती हैं और उनसे बहुत से उल्टे-पुल्टे समझौते आदि करती-फिरती हैं। वस्तुतः ऐसी लड़कियाँ-महिलाएँ आदमी-जात की कमजोर-कड़ी को पकड़कर अपने मादा-जिस्म की पूरी कीमत वसूलती चलती हैं और फिर कुछ समय बाद........! इससे भी इस दुष्प्रवृत्ति को उकसावा-बढ़ावा मिलता है । अतः इस संदर्भ में, हमें इस पहलू को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।


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