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नया हरियाणा

सोमवार , 22 अप्रैल 2019

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अवसादी मन

अाभासी रिश्तों के जाल में उभरती मानसिक समस्याएँ

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8 अक्टूबर 2018



नया हरियाणा

लगातार बढ़ती जा रही मानसिक रोगियों की संख्या ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. विकास की अदृश्य राह पर चलते हुए हम आज अपनी सामान्य जिन्दगी को पीछे छोड़ते बस अंधाधुंध आगे बढ़े चले जा रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2020 तक भारत में उदासी अथवा अवसाद में दूसरा सबसे बड़ा रोग होगा. राष्ट्रीय मेंटल हेल्थ सर्वे 2015-16 के आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में 18 से अधिक उम्र वाले 5.25 फीसदी लोग अवसाद के ग्रसित हैं. इसका मतलब हर 20 में से एक व्यक्ति को मानसिक अवसाद ने घेरा हुआ है. आजकल बच्चों में भी तनाव, व्याकुलता और आत्मविश्वास में कमी जैसी मानसिक बीमारियाँ देखने को मिल रही है. WHO के अनुसार, दुनिया भर में मानसिक, न्यूरोलॉजिकल व नशे की लत के शिकार लोगों में से करीब 15% मरीज़ भारत में हैं. मेंटल हेल्थ केयर बिल में अत्यधिक शराब व मादक पदार्थों के सेवन को भी मानसिक रोगी की श्रेणी में रखा गया है. 5 करोड़ से ज्यादा लोग अवसाद और 3 करोड़ से ज्यादा आबादी एंग्जाइटी डिसऑर्डर से ग्रस्त है. बीते साल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी कह चुके हैं कि भारत मानसिक स्वास्थ्य महामारी के मुहाने पर खड़ा है और लगभग 90% मरीज चिकित्सा की सुविधा से वंचित हैं.

आभासी रिश्तों के दौर में सूचनाओं और संवाद का निर्बाध प्रवाह तो जारी है किन्तु अपने मन की बात कहने-सुनने का परिवेश उपलब्ध नहीं. जिसके कारणवश अवसाद, तनाव, अकेलापन, बेचैनी, क्रोध, घुटन, भय, शक, अनिंद्रा और एंग्जाइटी डिसऑर्डर जैसी समस्याएँ अपनी जड़ें मजबूत करती जा रही हैं. नेशनल हेल्थ प्रोफाइल की मानें तो 2000-2015 के बीच आत्महत्या के मामलों में 23 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. जिसका कारण सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दे, भेदभाव, नौकरी की भागदौड़ इत्यादि रहते हैं. WHO के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य बजट का महज़ एक फीसदी ही मानसिक रोगों के हिस्से आता है. ऐसे में निरन्तर बढ़ती जा रही मानसिक रोगियों की संख्या बेहद चिन्ता का विषय है. मौजूदा हालातों के अनुसार, भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर महज 3.5 मनोचिकित्सक हैं. यही नहीं, अधिकांश परिवार ऐसी मानसिक बीमारियों को न केवल छिपाते हैं बल्कि इसका इलाज भी आवश्यक नहीं समझते. दुर्भाग्यपूर्ण कुछ लोग अंधविश्वास में फंसकर शोषण का शिकार बन जाते हैं.
1982 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किया. किन्तु मनोचिकित्सकों और बजट की कमी के चलते अधिक प्रभावी साबित नहीं हुआ. हालांकि इस कार्यक्रम का उद्देश्य जनमानस में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाना था, जो कि एक स्तर तक सफल भी रहा. 1987 में मेंटल हेल्थ एक्ट भी बनाया गया जो कि मनोरोगों से संबंधित कानून है. बावजूद इसके लोगों में ऐसे रोगियों के प्रति संवेदनशीलता देखने को नहीं मिलती. 
विकास की राह पर चलते-चलते हम कहाँ, किस ओर जा रहे हैं, ऐसा नहीं है कि हम नहीं जानते या कह सकते हैं कि जानना ही नहीं चाहते. आज की भागदौड़ की जिन्दगी में अगर आप चलने की सोचोंगे तो आप पीछे रह जाओंगे और यदि पीछे रह गये तो अवसाद आकर आपको घेर लेगा. विकास की धुरी पर भागते समाज में ऐसी अनेक विसंगतियाँ आ गई हैं जिनके चलते जीवन पीछे छुट गया है. 


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