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नया हरियाणा

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

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मिलिए शांति के नोबेल पुरस्कार विजेताओं से- नादिया मुराद व डेनिश मुकवेगे

नादिया, डॉक्टर मुकवेगे यौन हिंसा के खिलाफ मुखर रहे हैं.

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8 अक्टूबर 2018

विश्वप्रिया लतिवाल

वर्ष 2018 का नोबेल शांति पुरस्कार संयुक्त रूप से इराक़ी महिला नादिया मुराद व कोंगो गणराज्य के गायनेकोलोजिस्ट डॉ. डेनिश मकवेग को दिया गया है। दोनों ही स्त्री अधिकार व एंटी-रेप एक्टिविस्ट हैं तथा इस क्षेत्र में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। वे इस क्षेत्र में हॉलीवुड के हार्वे वेनस्टेन के ख़िलाफ़ सारी दुनिया में एक नई क़िस्म की जागरूकता लाने वाले ‘me too movement’ के पहले से ही स्त्री अधिकारों पर काम कर रहे हैं। इस आंदोलन की प्रचार-प्रसार सोशल मीडिया पर खूब किया जा रहा है। खासकर भारत जैसे देशों में। सोशल मीडिया की मुहिम कितना बदलाव कर सकेगी, इस पर फिलहाल कहना मुश्किल है, क्योंकि भारत में सोशल मीडिया का चरित्र कुछ-कुछ भेड़चाल जैसा बनता जा रहा है या यूं कहे कि देखा-देखी वाला काम करने का रिवाज प्रमुखता से उभर रहा है। इसके सामाजिक-मनोवैज्ञानिक या अन्य कारण भी हो सकते हैं। फिलहाल इस विमर्श में न जाकर फोकस उन महानुभवों पर करते हैं जिन्हें नॉबल पुरस्कार मिला है।

नादिया मुराद 
नादिया मुराद 25 वर्षीय वो पहली इराक़ी यज़ीदी महिला हैं जिन्हें 2018 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलने जा रहा है। लेकिन इस पुरस्कार के मिलने से पहले वो एक यज़ीदी एक्टिविस्ट व एंटी-रेप एक्टिविस्ट हैं। 20 वर्ष की उम्र में उत्तरी इराक़ के ‘सिंज़र’ शहर के ‘कोचो’ गाँव की रहने वाली नादिया का ISIS जिहादियों द्वारा अपहरण कर लिया जाता है। ISIS जिहादियों का पहला मक़सद अल्पसंख्यक यज़ीदी समुदाय को ख़त्म करना होता है लेकिन जब वो खुबसूरत औरतों व बच्चियों को देखते हैं तो उनको उनका बेरहमी से रेप करने व दास मार्केट में बेच देने के अलावा उन्हें और कुछ नहीं सुझता है। उनके लिए वो महज़ एक सामान हैं जिनका आसानी से उन्हें मुहं माँगा दाम मिल सकता है। 
नादिया की माँ व 6 भाईयों की अल्पसंख्यक यज़ीदी समुदाय को ख़त्म करने वाले कैंपेन के तहत मौत हो जाती है। तथा नादिया को ISIS के जमावड़े वाले शहर ‘मोसुल’ में लाया जाता है जहाँ उसे पहली बार उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ छुआ जाता है। नादिया कहती हैं कि, “मुझे आग की तरह महसूस हुआ, इससे पहले मुझे उस तरह कभी भी नहीं छुआ गया, मेरे आँसू उसके हाथ पर गिर रहे थे, लेकिन वो फिर भी नहीं रूका”. मोसुल में सबसे पहले जिहादी उसका धर्म परिवर्तन करते हैं, व उसके बाद नादिया को एक जज के हाथों बेच दिया जाता है। वो जज नादिया को अपनी चौथी सेक्स स्लेव के तौर पर रखता है व उसका दिन में अनगिनत बार बेरहमी से रेप होता है। अगर वो उस दरिदंगी के आगे अपनी आँख भी बंद करती है तो उसे आँख भी बंद नहीं करने दी जाती है, और अगर ऐसा करती है तो उसके लिए उन्हें फिर एक नई तरह की निर्दयता के साथ पीटा जाता है। उनको कसी हुई पार्टी ड्रेसेज पहनने को, मेकअप करने को मजबूर किया जाता है व मेहमानों के सामने नुमाइश के तौर पेश किया जाता है व चाय नाश्ता परोसने को कहा जाता है। एक बार जब वो वहाँ से भागने की कोशिश करती है लेकिन बदक़िस्मती से नहीं भाग पाती है, भागने की कोशिश करने के ‘जुर्म’ में उसका 6 गार्ड्स के द्वारा उन्हें सबक़ सिखाने के तौर पर फिर से गैंग-रेप किया जाता है।
गुमनाम व सन्नाटेदार अंधेरों में भी वो साहस का दामन नहीं छोड़ती हैं व वहाँ से निकलने की हर कोशिश करती रहती हैं। अपनी किताब ‘द लास्ट गर्ल’ में वो कहती हैं,” ISIS जिहादियों ने उनका सम्मान छीनने की कोशिश की, लेकिन सच तो यह है कि उन्होंने अपना ख़ुद का सम्मान खोया है।”

टाइम मैग्जीन के साथ एक बातचीत में नादिया कहती हैं, “मैं ख़ुद को नहीं मारना चाहती थी, लेकिन मैं चाहती थी कि वो मुझे मार दें”। 
आख़िरकार एक दिन वो 3 महीनों के बेरहम व दर्दनाक माहौल से भागने में कामयाब हो जाती हैं, क्योंकि ग़लती से दरवाज़ा खुला रह जाता है। मोसुल का एक मुस्लिम परिवार उनकी भागने में व कुछ नक़ली काग़ज़ात बनवाने में मदद करता है, वो ISIS के क्षेत्र से भागकर उत्तरी इराक़ के दुहाक इलाक़े में लगे रिफ्यूजी कैंप में पहुँच जाती हैं। उसी संस्था की मदद से वो अपनी जर्मनी में रह रही बहन से मिल पाती हैं जिनके साथ वो अब रह रही हैं।
इन तीन महीनों में सारी ज़िंदगी तक ना भूल सकने वाली दरींदगी की भयावहता को सहकर वो शुरू करती हैं अपनी ज़िंदगी का वो नया अध्याय जिसमें वो अपना दुख दूर करने का मरहम भी पाती है व अपने ही जैसी अनगिनत लड़कियों के लिए आवाज़ उठाती हैं। नादिया यज़ीदी अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं व अब उनकी इस लड़ाई में प्रमुख मानवाधिकार एक्टिविस्ट अमाल क्लूनी भी उनके साथ हैं।
वर्ष 2016 में उन्हें UN द्वारा First Goodwill Ambassador for the Dignity of Survivor of Human Trafficking नियुक्त किया गया तथा Council of Europe द्वारा Vaclav Havel Human Right Prize से सम्मानित किया गया है। नादिया बड़ी बहादुरी से अपनी किताब में कहती हैं कि ,”मैं मेरी जैसी कहानी की आख़िरी लड़की होना चाहती हूँ।” उनका यह कथन साफ़ दर्शाता है कि वो हरगिज़ नहीं चाहती कि इस दुनिया में किसी भी दूसरी लड़की के साथ फिर कभी ऐसा हो व इसके लिए वो दिन-रात प्रयासरत हैं। वो अपने यज़ीदी समुदाय का भी एक शांतिपूर्ण व सम्माजनक अस्तित्व चाहती हैं तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारो के लिए भी काम कर रही हैं। मलाला युसुफजई के बाद वो दूसरी सबसे कम उम्र की शांति पुरस्कार पाने वाली महिला हैं।
डेनिश मुकवेगे 
डेनिश मुकवेगे एक 63 वर्षीय सर्जन, गायन्कोलोजिस्ट व स्त्री अधिकारों के एक्टिविस्ट हैं जिन्होंने अपनी लगभग सारी ज़िंदगी रेप विक्टिम्स को न्योछावर कर दी हैं। उन्होंने ‘मुकवेगे फ़ाउन्डेशन’ की स्थापना की है तथा उनकी साइट के अनुसार वे और उनका स्टाफ़ अब तक लगभग  40000 महिलाओं को नई ज़िंदगी प्रदान कर चुका है। उनका अस्पताल व फ़ाउन्डेशन रेप विक्टिम्स को क़ानूनी व मनोवैज्ञानिक सहायता भी प्रदान करता है। वे कोंगों सरकार की स्त्री अधिकारों व रेप के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही ना करने पर बुरी तरह आलोचना करते हैं। उनके स्त्री अधिकारों पर उल्लेखनीय कार्यों के कारण उन्हें ‘The man who mends Women’ कहा जाने लगा है।
 


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