Privacy Policy | About Us | Contact Us

नया हरियाणा

गुरूवार, 13 दिसंबर 2018

पहला पन्‍ना English सर्वे लोकप्रिय हरियाणा चुनाव राजनीति अपना हरियाणा देश शख्सियत वीडियो आपकी बात सोशल मीडिया मनोरंजन गपशप

अर्पित धूपर ने प्रदूषण को किया बोतल में कैद

उन्हें इस फ़ाउन्डेशन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कहाँ-कहाँ से ग्रांटस लेने की ज़रूरत पड़ी है वो ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता सिद्ध करता है। 

Chakr Innovation, Mr Arpit Dhupar, naya haryana, नया हरियाणा

30 सितंबर 2018

विश्वप्रिया लठिवाल

इस बात का जवाब तो जनता ही दे सकती है कि उनके आदर्श हमेशा  क्रिकेटर, नेता व अभिनेता ही क्यूं होते हैं? या फिर मीडिया में अकेले इन्हीं के चर्चे क्यूँ रहते है?
समाज के बहुत ही आवश्यक एंव ज्वलनशील मुद्दों पर, स्वास्थ्य के क्षेत्र में निष्ठा भाव से काम कर रहे लोगों को, पर्यावरण के बारे में चिंतित व उसको संज्ञान में लेते हुए नई-नई खोज करने वालों को समाज में हीरो क्यों नहीं माना जाता व उनको वास्तविक ‘सेलेब्रिटी’ होने का सम्मान व पहचान क्यूँ नहीं मिल पाती? ये कुछ सवाल हमेशा बिना जवाब के बने रहते हैं।
आज हम एक ऐसे शख़्स की बात कर रहे हैं जिनका नाम है अर्पित धूपर और जो एक मेकेनिकल इंजीनियर हैं। अर्पित ‘चक्र फ़ाउंडेशन’ में सी.टी.ओ.(चीफ़ टेकनिकल इंजीनियर)हैं, चक्र फ़ाउंडेशन एक ऐसी संस्था है  जो केवल ऐसे आविष्कार करने को प्रतिबद्ध है जो किसी ना किसी तौर पर पर्यावरण को बचाने व एक सतत विकास में सहायक हो सकते हैं। 
अर्पित ख़ुद दमघोटू व ज़हरीली हवाओं के शहर दिल्ली में पले-बढ़े हैं। हाँ, वो ही दिल्ली महानगर जो तमाम दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में से 13वें स्थान पर आता है। वैसे तो दिल्ली को ग्रीन सिटी कहा जाता है और आसमान से लिए जाने वाले व्यू में वो दिखती भी एकदम से ग्रीन ही है। पर हकीकत और अफसानों में जितना फर्क होता है, उतना ही दिल्ली के ग्रीन दिखने और प्रदूषित होने में है।
दिल्ली की हवाओं में हर पल जहर की मात्रा बढ़ती ही जा रही है। जिसकी हवा कैंसर, फेफड़ों, गुर्दे के व मस्तिष्क के रोगों को बढ़ावा देने में बहुत हद तक साथ निभाती है। और यह जहर गर्भवती महिलाओं के लिए व उनके अभी कोख में पल रहे बच्चों के स्वास्थ्य के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है।
अर्पित व उनकी संस्था ‘चक्र फांउडेशन’ इन ज़हरीली हवाओं का  किसी हद तक समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने ऐसी मशीन की खोज की है जो डीजल के जनरेटर से निकलने वाले धुएँ के काले कार्बन जिसे ‘सूट’ भी कह जाता है, को पर्यावरण में ज़हर बनकर घुलने से पहले ही रोक लेगा। डीज़ल जनरेटर का धुआँ जो कि पर्यावरण प्रदूषण का एक बड़ा कारण है उससे निकलने वाले कार्बन युक्त धुएँ को ना सिर्फ़ वो मशीन उसे रोककर अवशोषित कर लेगी बल्कि उसके बाद बचे हुए कार्बन का प्रयोग पेंट व स्याही के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा।
अर्पित इससे पहले भूमि को धीरे-धीरे बंजर बना देने वाले यूरिया के प्रयोग को कम कर देने वाली मशीन का आविष्कार भी कर चुके हैं। जिसका इस्तेमाल करके लगभग 40 फ़ीसदी यूरिया का इस्तेमाल घट सकता है बल्कि 25 फ़ीसदी तक उत्पादन भी बढ़ाने में सहायता कर सकता है ।
अर्पित को American Society of Mechanical Engineers, Department of Science & Technology Lockheed Martin व भारत के FICCI के द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। और यह एक बहुत खुबसूरत संयोग है कि अर्पित को 26 सितम्बर, उनके जन्मदिन पर उन्हें UN द्वारा UN Champions of Earth Award द्वारा सम्मानित किया गया है। फंड व ग्रांटस इकट्ठा करने के बाद उन्होंने अपने इस आविष्कार का commercialisation शुरू किया है, जिनमें से अधिकतर फ़ंड American Society for Mechanical Engineers, University of Chicago, General Atlantic’s Echoing Green Fellowship व सिर्फ़ एक भारतीय विभाग Department of Science &Technology से एकत्र हुए हैं। उन्हें इस फ़ाउन्डेशन को सुचारू रूप से चलाने के लिए कहाँ-कहाँ से ग्रांटस लेने की ज़रूरत पड़ी है वो ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता सिद्ध करता है। 
लेकिन सवाल यह है कि इन सम्मानों के अलावा व्यवस्था व विभागों द्वारा उनके इतने ज़रूरी व एक  लाभदायक आविष्कार को तुरंत प्रभाव से जनमानस तक क्यूँ नहीं पहुँचाया जा रहा है? ऐसा प्रतीत होता है कि अवाम, पर्यावरण व स्वास्थ्य जैसे गंभीर मुद्दों पर कोई बातचीत व संज्ञान ना लेने की रवायत-सी चल पड़ी है। कार्यालयों में कार्यरत अफसरों का काम सिर्फ़ वर्चुअल व काल्पनिक विकास के आँकड़ो को मीडिया में फैलाना होता है, जिसका ज़मीन से कोई तालुकात नहीं होता है। और ये हालात तो तब है जब ये मालूम है कि उनकी यह खोज काफ़ी हद तक पर्यावरण के लिए, हमारी प्रकृति के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है। या फिर सरकारी विभागों व कार्यालयों की प्रतिबद्धता सिर्फ़ सत्तासीन पार्टी के एंजेडों को विज्ञापित करने की रह गई है। जहाँ पर्यावरण व उसके गिरते स्तर का मूल्यांकन करना व समाधान करना कोई मुद्दा ही नहीं रह जाता है।
 


बाकी समाचार