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नया हरियाणा

बुधवार, 21 नवंबर 2018

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चाचा अभय सिंह चौटाला-भतीजे दुष्यंत चौटाला में छिड़ा सत्ता संघर्ष : किस में है कितना दम

दुष्यंत चौटाला ने जननायक सेवादल को दोबारा एक्टिव किया है.

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19 सितंबर 2018

प्रदीप डबास

कहते हैं किसी लकीर को छोटी करने के लिए उससे छेड़छाड़ नहीं की जाती, बल्कि उससे बड़ी लकीर खींचनी होती है। इनेलो के भीतर की राजनीति में जो अपनी लाइन बड़ी खींचने की होड लगी है, उसमें दुष्यंत चौटाला ने एकदम आगे बढ़ाया है। भविष्य में चाचा की मुश्किलें बढ़ती हुई नजर आ रही हैं। जमीनी स्तर पर अभय सिंह चौटाला भले ही भतीजे से मजबूत हों, पर भतीजा सोशल मीडिया के जरिए और छात्र संगठन इनसो के माध्यम से चाचा को चित्त करने का चौतरफा खेल खेल रहा है। सोशल मीडिया जहां इनेलो कार्यकर्ताओं के दिमाग में दुष्यंत की एक साफ छवि गढ़ रहा है, वहीं अभय सिंह की छवि एक आक्रामक नेता की गढ़ी जा रही है। जिससे अभय सिंह अनजान नजर आते हैं। जिसका खामियाजा उन्हें भविष्य में भुगतना पड़ सकता है। इस की तरह के संभावनाएं राजनीतिक चर्चाओं में चलती रहती हैं।
सोशल मीडिया को लेकर अभय सिंह की उपेक्षा उन्हें सत्ता से तो दूर ले ही जा रही है, बल्कि पार्टी से भी दूर ले जा सकती है। कहीं अभय सिंह का हाल भाजपा के आडवाणी और मुलायम के भाई जैसा हाल न हो जाए। खैर... 
 दुष्यंत चौटाला ने जननायक सेवादल को फिर से सक्रिय कर दिया है। यह भाजपा के आरएसएस और कांग्रेस के सेवा दल की तरह काम करेगा। कार्यकारिणी गठित हो गई है और तमाम महत्वपूर्ण पदों पर दुष्यंत चौटाला के करीबी समझे जाने वाले चेहरों को तरजीह दी गई है। जरा समझिए क्यों जरूरत पड़ी करीब 16 साल से निष्क्रिय दल को ताजा करने की?
आ देखें जरा किस में कितना है दम, जमकर रखना कदम। अभय सिंह जहां जमीनी स्तर पर जमकर कदम रख रहे हैं, वहीं दुष्यंत मीडिया में पैर पसार रहे हैं। सही में इंडियन नेशनल लोकदल में ये दम दिखाने का वक्त है। 2019 के समर के लिए पार्टी हर वो पैंतरा अपना रही है जिसे चलकर सत्ता की दहलीज लांघी जा सके, लेकिन सवाल ये उठ रहा है कि अगर पार्टी सत्ता में आई तो सत्ता की ये दहलीज लांघने वाले दल का मुखिया कौन होगा?
सेवादल के जरिए क्या ये सत्ता रूपी मेवा दुष्यंत को मिलेगा या अभय सिंह चौटाला को? जी हां, यहां सवाल चेहरे का बड़ा हो रहा है। परिवार के भीतर क्या चल रहा है और क्या नहीं उसका जिक्र नहीं कर रहे हैं, लेकिन समर्थक जरूर अपने-अपने चेहरों के पीछे खड़े दिख रहे हैं। ये बात तो सभी जानते हैं मोहरे चेहरों के इशारों बिना एक कदम नहीं चलते। किसी को किसी बात से मलाल है तो कोई किसी को सिर्फ सीएम ही देखना चाहता है।
अब समर्थकों में इतना उत्साह तो नेता भी दो कदम आगे बढ़ने की सोचता ही है। इनेलो सांसद दुष्यंत चौटाला ने बड़ा सियासी धमाका करते हुए जन नायक सेवादल का गठन कर दिया। या यूं कहें कि इस गैर राजनीतिक संगठन को करीब डेढ दशक बाद फिर से जिंदा कर दिया। क्योंकि लड़ाई जितनी बाहर मुश्किल है, उससे ज्यादा मुश्किल भीतर की लड़ाई है। चाचा आसानी से गद्दी छोड़ने वाले हैं तो नहीं।
दूसरी तरफ दुष्यंत चौटाला का यह कदम प्रदेश की राजनीति में बहुत बड़ा फैसला कहा जा सकता है। इनेलो की भीतरी सियासत के बीच दुष्यंत चौटाला ने जननायक सेवादल का गठन कर कुछ संकेत देने की कोशिश तो की है। जिसे राजनीति के जानकार बेहतर समझ रहे हैं।
बताया जा रहा है कि जननायक सेवादल आरएसएस और कांग्रेस सेवादल की तरह काम करेगा और पार्टी को मजबूत करेगा। हालांकि ये संगठन पूरी तरह गैर राजनीतिक होगा और इससे जुड़े लोग पांच साल तक चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे। कहा ये भी जा रहा है कि दुष्यंत चौटाला ने पार्टी संगठन को समर्पित कैडर की फौज का तोहफा देते हुए यह नया संगठन कायम किया है। इसमें एक दूर की कोड़ी यह भी हो सकती है कि यह 2024 की तैयारी हो, ताकि 2019 की हार का ठीकरा चाचा अभय सिंह पर फोड़कर अगली बार खुद को आगे किया जा सके और उस समय ये जननायक सेवादल जमीन पर मजबूती से पैर पसार चुका होगा। जिसका दमखम चाचा अभय सिंह भरते हैं।
सियासत के जानकार सेवादल के गठन को दुष्यंत चौटाला की ओर छोड़े गए बह्रमास्त्र के तौर पर देख रहे हैं। पार्टी समर्थकों में जिस तरह मुख्यमंत्री पद को लेकर बंटवारा दिख रहा है उसका आधार भी जरूर कुछ होगा ही। ऐसे में दल का गठन और उसमें अपने करीबियों की नियुक्ति कुछ इशारा तो जरूर करती है। अब देखना यह होगा कि जननायक सेवादल और इनसो मिलकर पार्टी को किस तरफ लेकर जाते हैं।
 


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