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बुधवार, 13 दिसंबर 2017

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सबसे बड़े ‘सरकारी’ हैं यशपाल मलिक

जाट समुदाय के साथ जितना बड़ा छल हुआ है और इसके परिणामस्वरूप जितना नुकसान इससे हुआ है उसकी पूर्ति दशकों तक होना संभव नहीं, और एक नेता के रूप में इस सबके लिए जिम्मेदार केवल और केवल यशपाल मलिक हैं।

naya haryana

2 दिसंबर 2017

नारायण सिंह तेहलान

मलिक की किसी भी बात को जवाब देने योग्य नहीं समझता : कैप्टन अभिमन्यु (दैनिक भास्कर).... 

कैप्टन अभिमन्यु ने एकदम सही कहा। जिस व्यक्ति को जाट जनता ने सिरमौर बनाया, अथाह प्यार, विश्वास और अकूत धन दिया। उसने एक झटके में सब खो दिया। अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिए दूसरों पर अनर्गल आरोप मढ़ना, अब यशपाल मलिक की आदत-सी बन गई है। जिसके चलते वह और नीचे ही नीचे गर्कता जा रहा है। 
असल में जाटों द्वारा अशंक विश्वास मिलते ही कुछ नेताओं ने उसे लपक कर गोदी में बैठा लिया और वह एक बालक की तरह एक भावी कल्पित झुनझने को देखकर खेलने लगा। उसे न जाट समुदाय याद रहा, न संघर्ष की दिशा और दशा की उसे कोई चिंता रही। उसमें अहंकार अज्ञान और गफलत एक साथ घर कर गए। जिसका सबूत जसिया की रैली और भूमिपूजन हैं। अगर यह रैली आरक्षण, जेलों में बंद लोगों की रिहाई, मुकदमों की वापसी आदि को लेकर की जाती तो अति स्वागत योग्य होती, परंतु परंतु इन मुद्दों का तो रैली के साथ किंचित मात्र भी सरोकार कहीं दिखाई दिया। 

यह तो कुछ लोगों का परस्पर लाँगड़ जोड़ जमावड़ा मात्र सिद्ध हुआ, जो असल में था ही। जहां तक बात थी भूमिपूजन की तो वर्तमान परिदृश्य और परिस्थिति में इससे बड़ा बेहूदा और मूर्खतापूर्ण छद्म काम और कोई हो ही नहीं सकता। न आरक्षण मिला, न मुकदमें वापिस हुए, धड़ाधड़ सजाएँ हो रही हैं। मुरथल और मुनक नहर मामलों की जांच चल रही हैं। सीबीआई जांच जारी है। फिर ऐसी कौन-सी उपलब्धि है, जिससे रीझकर सब कुछ भुलाकर चंदे के धन से शिक्षण संस्थाएं बनाई जा रही हैं। 

शिक्षण संस्थान बनाना गलत नहीं, लेकिन तरीका और समय दोनों निहायत गलत हैं। यह तो एक झपट्टामार जैसा आचरण हुआ। इसे ही तो 'चिताओं पर व्यापार' कहते हैं। कुछ भाई यह समझ सकते हैं कि मैं कैप्टन की बेजा तरफदारी कर रहा हूं। लेकिन मैं सिर्फ वह कह रहा हूँ, जिसे मैं ठीक समझता हूँ और इससे मुझे सुकून मिलता है। वर्ना तो न मेरी तरफदारी की कैप्टन को ज़रूरत और न मेरे विरोध का यशपाल पर कोई असर होने वाला। कैप्टन पर मुख्य आरोप यह लगाया जाता है, और यह अपने आकाओं की शह पर लगाया जाता है, कि वे केस वापिस नहीं ले रहे कि उन्होंने जसिया रैली के विरोध में कुछ लोगों को तैयार किया है। ये दोनों आरोप निराधार हैं।
 1) क्या यशपाल मलिक और उनके साथियों का यह नैतिक कर्तव्य ही नहीं, दायित्व भी था कि आरक्षण आंदोलन के दौरान कैप्टन के परिवार और जायदाद के आग में झोंके जाने पर संवेदना और सहानुभूति प्रकट करने के लिए जाते। ताकि आगे किसी समय उनसे केस वापिस लेने के लिए कहने का आधार और औचित्य तैयार होता। इसके बजाय उसे धमकाया गया। जाति से बहिष्कृत करने का भय दिखाया गया। बार-बार अपमानित किया गया। असल में यह सब एक सोची समझी चाल के तहत किया गया था। जिसका मकसद यह था कि केस वापसी हो ही न, ताकि कैप्टन के खिलाफ आग उगलने का आधार बना रहे। अगर समिति वाले दूसरे सभी खापों और संगठनों के प्रतिष्ठित लोगों को साथ लेकर विनम्रतापूर्वक अनुरोध करते तो, मैं नहीं समझता कि चौधरी मित्रसैन जैसे सामाजिक परिवार के एक संभ्रांत सदस्य के रूप में कैप्टन ना कहते। इसलिए जाट समुदाय के साथ जितना बड़ा छल हुआ है और इसके परिणामस्वरूप जितना नुकसान इससे हुआ है उसकी पूर्ति दशकों तक होना संभव नहीं, और एक नेता के रूप में इस सबके लिए जिम्मेदार केवल और केवल यशपाल मलिक हैं। मैं उन द्वारा हमारे जैसे लोगों पर चस्पां किये गये सब विशेषणों का नाम लेना तो मैं अपनी शालीन छवि के विरुद्ध समझता हूँ, परंतु इतना अवश्य कहूँगा कि आज के दिन जाट समुदाय में यशपाल से बड़ा सरकारी और कोई नहीं।

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