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नया हरियाणा

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

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थापली के बाद मनोहर सरकार दिख रही है फूल फार्म में

मनोहर सरकार ने चुनाव का बिगुल फूंक दिया है.

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12 सितंबर 2018

प्रदीप डबास

जब रणभेरी बजने वाली हो, जब शतरंज पर पासे बिछ चुके हों तो रणनीतियां बनानी जरूरी हो जाती हैं। सूबे के बीजेपी नेता एक ऐसा चक्रव्यू तैयार करना चाहते हैं कि जिसे विपक्ष किसी भी सूरत में भेद ना सके। थापली की ठंडक के बीच जंग की तैयारियों को लेकर चर्चा की गई। इस मंथन में सूबे के तमाम मंत्री और सभी निगमों और बोर्डों के चेयरमैन मौजूद थे, लेकिन विधायक नहीं थे। पार्टी कहती है कि उनके लिए नहीं थी ये मीटिंग लेकिन जानकार इसका मतलब कुछ और निकाल रहे हैं।
2019 के समर के लिए बीजेपी ने अपने यौद्धाओं को अब मैदान में उतारना शुरू कर दिया है और जिम्मेदारियां तय होने लगी हैं। थापली में जुटे बीजेपी के बड़े नेताओं ने एक पूरा कार्यक्रम आने वाले समय के लिए तय कर लिया है। मुख्यमंत्री समेत पार्टी के तमाम मंत्री और सभी निगमों और बोर्डों के चेयरमैन इस मंथन में मौजूद थे। अगर कोई नहीं था तो वे विधायक थे जिनके पास कोई पद नहीं है। देखिए साहब ये तो राजनीति है, यहां हर बात का अर्थ निकाला जाता है। या यूं कहें कि निकाला जाना जरूरी भी होता है तो गलत नहीं होगा। कुछ जानकार कहते हैं कि थापली में बिना पद वाले विधायकों को इस लिए नहीं बुलाया गया क्योंकि ये आशंका भी थी कि कहीं कोई फिर से सचेतक वाले अवतार में ना आ जाए।
दूसरी तरफ इन विधायकों की अगली बार टिकट कटने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हो सकता है भाजपा अपनी रणनीति को अभी सीमित करके चल रही हो।
हम ये बात इसलिए कह रहे हैं क्योंकि पार्टी के कई ऐसे विधायक हैं जो वरिष्ठ भी हैं और उन्हें उम्मीद भी थी कि सत्ता में आए तो उन्हें सम्मान मिलेगा। अब मंत्रिमंडल में किसी तरह के उल्टफेर की गुंजाइशें तो बची नहीं इसलिए कुछ विधायकों के चेयरमैनी की आश लाने को भी गलत नहीं माना जा सकता। अब अगर उतना भी ना मिले तो फिर पार्टी इस तरह के मंथन बैठकों में बुलाने से हिचकेगी ही ना...वैसे सूबे में बीजेपी के मुखिया सुभाष बराला इस मंथन को रूटीन बैठक ही बताते रहे हैं लेकिन सवाल ये भी तो है कि रूटीन बैठक वो भी थापली में क्यों?
वैसे बैठक से जो भीतर की बात निकलकर आई है उसमें सबसे महत्वपूर्ण ये है कि बीजेपी अपने उस हिस्से को सबसे ज्यादा मजबूत रखना चाहती है जहां से पार्टी ने 2014 में सबसे ज्यादा सीटें जीती थीं। यानि जीटी रोड बेल्ट। सरकार के चार साल पूरे होने पर 28 अक्तूबर को पार्टी ने करनाल में एक बड़ी रैली करने का फैसला लिया और इस रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुलाने की तैयारी है। पिछले चुनाव में जीटी रोड बेल्ट से ही भाजपा के खाते में दो दर्जन से ज्यादा सीटें आई थीं। लोकसभा चुनाव में भी चार सीटें अंबाला, करनाल, कुरुक्षेत्र और सोनीपत जीटी रोड बेल्ट ने ही दी थीं। इसलिए इस बेल्ट पर दोबारा फोकस किया जाना पार्टी की मजबूरी है।
वैसे विधायक तो दक्षिण हरियाणा से भी बीजेपी को भरपूर मिले थे। लेकिन यहां पार्टी की रणनीति क्या रहती है ये देखना काफी महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि यहां राव इंद्रजीत एक बड़ा फैक्टर होने वाले हैं। हालांकि यहां के विधायक भी सम्मान की महत्वाकांक्षा कई बार जाहिर कर चुके हैं। यहां से सचेतकों की संख्या भी काफी थी।
वक्त कम है और काम बहुत ज्यादा ऐसे में हर एंगल से विचार करना और रणनीति तैयार करना बीजेपी के लिए जरूरी हो जाता है। ये भी माना जाना चाहिए कि अगर इस बार बिना पद वाले विधायकों का नंबर नहीं आया तो शायद पार्टी ने इनके लिए कुछ और जिम्मेदारियां सोचकर रखी हों। हालांकि इसके निशान मंथन के तुरंत बाद बनी तीन कमेटियों में दिखे भी, लेकिन सवाल तो प्रशासनिक ताकत का है।
थापली के बाद कल के विधानसभा सेशन में जिस तरह मनोहर सरकार ने बिजली के रेट लगभग आधे किए हैं, उससे साफ लग रहा है कि हरियाणा की भाजपा सरकार आने वाले समय में चुनाव को देखते हुए और ज्यादा फूल फार्म में नजर आएगी. अगर भाजपा इसी तरह जनता को राहत देती रही तो विपक्ष जो कि पहले ही मुद्दा विहीन हो चुका है, उसकी रीढ़ एकदम से टूट जाएगी।


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