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नया हरियाणा

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

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बचपन की यादों  से :अचपली  काली की खुराफातें

सुनीता करोथवाल चांग गांव(हरियाणा) की बेटी हैं. जो हरियाणवी संस्कृति से जुड़े लोकरंगों को अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करती हैं. जिसमें परंपरा और आधुनिकता का संतुलन निरंतर बना रहता है और अपने देहाती लहजे में वो समय के साथ खोते हुए मूल्यों को लेकर सचेत हैं.

naya haryana

1 दिसंबर 2017

 सुनीता करोथवाल

कती  कागज बरगा सफेद  रंग था  छोटी  थी  जब, तो बाबा नै  लाड चा  मैं काली  नाम धर  दिया। कदे  म्हारी  लाडो  कै  टोक(नजर )लाग  जावै  नै। दोनों दादा  पोती  एक दूसरे  की रै  मैं रया  करदे, के मजाल  कोए दूसरा  छो  मैं आज्या। बाबा  कती खा  लेंदे  आगले नै। बस उनके  लाड -प्यार नै  दुनियादारी सिखायी, अपने  काम करणे सिखाए,पर अलबाद (शरारत)भी खूब सिखाई।
   बाबा  खेत मैं जांदा तो काली  तै बोलदा -"कालो रोटी  ली आईए मेरी आर तेरी  दादी  की। "ठीक सै बाबा  ली आऊंगी, कहकै  काली स्कूल चली  जाती। पेपरां  के दिन थे, खेत मैं कपास खिल़री, आर माँ  बिमार। स्कूल तै आके रोटी  बंधवा  के चली  गयी खेत  मैं। रास्तै  मैं नूनै नूनै  देखदी  जा  पहुँची  गोरूए आळे खेत, बीच  मैं छोटा  गाम  पड़ा करदा। खेत  म्हं जाके  पहलैम शहतूत  पै चढकै  देख्या, दादी  कौण  से  किल्ले  मैं सै?? 
    दादी  गीत गावै  आर लागरी  बिचारी  बूढ़ी लुगाई  काल(दुखी ) होई। बाबा  दूसरे  किल्ले  के नाके समारण लागरया। काली नै सोच्या  जै  तूं  दादी  नै  रोटियाँ  की कवैगी  तो दादी  कपास  चुगवावैगी, तूं  नूं  कर चुपचाप  लिकड़ ले बेटा। उसनै  रोटियाँ  का  टिफ्फन शहतूत कै  बाँध  दिया, आर भाज  ली घर कानी। घर नै  समान  तैयार  करकै आ री गुडिया खेलण का। इब उसका ध्यान ओड़े अटक  रया। फेर  उल्टी आगी  के चाल थोड़ी  कपास  चुग  ले। रास्ते मैं छोटे  गाम  की दुकान  पै  तै गज्जक रेवड़ी  लिए आर  दुकान- दुकान खेलिए ठाठ तै। वा भाज  कै कपास आले  किले मैं बड़गी। बाँध कै फिराक  की झोली  आर लागी  तावली तावली  कपास  चुगण। दादी  थोड़ी सी  दूर थी  आर दादी नै  ली देख के काली आगी। काली  तावली सी भर के चीजां  जितणी कपास  आर लिकडण  लागी  तो दादी  नै  मारया  रूक्का "काली,ए काली,छोरी  कित  कपास  नै  ले कै भाजै  सै? आज्या,एक फेर  तरवा  दे। पर,काली  क्या  नै  रूकै थी  ,ला ऐडियाँ  कै थूक आर दुकान  मैं आकै  पाछा  देख्या। खूब  सारी गज्जक आगी  कपास  की। किमे खायी, किमे  लुको  कै घर नै  ले आयी।
आकै पॉलिश की डिब्बी  की, पहले  तो पॉलिश काढ  के फेंकी। फेर कील  गेल  सुराख  करे आर ऊन के तागे  बाँध के तराजू बणाई। फेर एक मुट्ठी किसे के घर के आगे  तै बजरी  टोह  कै  लाई। फेर  सारे भाण भाईयाँ  नै  तोल- तोल  कै वे गज्जक खायी।
     इब  साँझ नै  जिब दादी ताती होयी घर नै आयी  तो काली आँगण  मैं खटोला घाले  बैठी दादी आळा। गामां मैं बड़े बडे घर हों ए सैं। एक दरवाजा गली  मैं था  दूसरा  सड़क पै  लिकड़ा  करदा। दादी दिखदे ए  काली भाजली  दूसरे  कानी  तै। घूम  कै  बाबा  गेल उल्टी ए एंट्री मारी। आर बोली  "बाबा आग्या ,बाबा,पाणी लाऊंबाबा,होक्का भरूं? बाबा,आज तो घर नै जी ए कोनी लाग्या  तेरै बिना। " बाबा  कसूता  राजी  होग्या। लाडो कै  सिर  पै हाथ फेर  कै  खाट पै बैठग्या,बराबर मैं काली बिठा  ली।
     इब दादी आयी हाथां  नै मारदी। आएँ,काली की तलाकण!एक मैं तो बिच्चा  कोनी,पाँच - सात  बणदी कोनी,मनै  तेरतै  के कही  थी एक फेर  तरवादे,भाज ली झोली भरकै  कपास  की। तलाकण घोड्यां की। तेरी घणी जीभ लप-लप करै  सै। तेरे टाकणा नै तोड दूंगी देख ले " काली  बाबा  कानी बेचारा-सा मुँह बणा  के बोली, "दादी  तनै  मन -मन मैं कही  होगी, मनै ना सुणी। मैं इसी ना सूं, काम ना कराऊं  मैं कपास  ना चुग  के लायी,बाछी  खातर  काचे  पत्ते  तोड कै  लायी थी।'" बाबा  बोल्या "कोये  नै  लाडो  इसनै  दिखता तो सै बी कोनी, आंदे ए होगी छोरी गेल शुरू। जा बेटी  तूं होक्का भरल्या मेरा। " दादी  बिचारी भुंडा-सा मुँह बणा  कै  रहैगी ओर के करदी। काली आगै  किसकी  चालै थी।
 

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