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नया हरियाणा

शनिवार, 17 नवंबर 2018

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जींद उपचुनाव : कांग्रेस टिकट पर जेपी के बेटे लड़ सकते हैं चुनाव

जेपी और सुरजेवाला का एक साथ आना बढ़ा सकता है जेपी का कद.

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8 सितंबर 2018

नया हरियाणा

बांगर की धरती पर हरियाणा की राजनीति के दो दिग्गजों का जो मिलन हुआ है. उसका असर जल्दी जींद में होने वाले उपचुनाव में दिख सकता है। चर्चाएं तो यहां तक चली हुई हैं कि जींद से कांग्रेस टिकट के दावेदार जेपी के भाई या उनके बेटे हो सकते हैं. दूसरी तरफ भाजपा के तीन नेताओं मनोहर लाल, कैप्टन अभिमन्यु और बीरेंद्र सिंह की तिकड़ी जींद में फूल खिलाने के लिए मोहरे बिछाने में लगी हुई हैं।

ऐसे में जेपी और सुरेजवाला का साथ आना जहां एक तरफ जींद के राजनीतिक अखाड़े में हलचल पैदा कर रहा हैं, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर हरियाणा के नेताओं में बेचैनी पैदा कर रहा है। जिसकी बानगी करनाल में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के उस बयान में देखी जा सकती है, जिसमें उन्होंने कहा है कि मैंने तो पहले ही कहा था कि आप दोनों एक ही जिले के हो, आप दोनों को मिलकर चलना चाहिए। मैंने रणदीप सुरजेवाला को भी बोला था और जेपी को भी बोला था।

यहां कुछ सवाल उठते हैं, क्या जेपी को अब यह अहसास हो गया है कि कांग्रेस में अब हुड्डा युग बीत चुका है और आने वाला समय रणदीप सुरजेवाला का आने वाला है? क्या जेपी चढ़ते सुरज को सलाम वाली कहावत का अपनाते हुए हाथ मिलाया है? या जेपी ने दोनों हाथों में लड्डू रखते हुए एक हाथ में सुरजेवाला तो दूसरे हाथ हुड्डा को रखते हुए अपने दोनों हाथ मजबूत किए हैं?

जींद जिले की राजनीति में भी नए समीकरण बनेंगे

 दोनों धुर-विरोधी नेताओं की कैथल में हुई जुगलबंदी से दूसरे राजनीतिक विरोधियों की नींद उड़ सकती है। आने वाले दिनों में इन नेताओं की एकजुटता का असर जींद की राजनीति में भी स्पष्ट देखने को मिलेगा। खासकर इस गठबंधन का सबसे ज्यादा नुकसान इनेलो को हो सकता है।

दोनों नेताओं ने परिस्थितियों को समझते हुए समझदारी भरा हाथ बढ़ाया है. क्योंकि दोनों नेता एक-दूसरे के पूरक हैं। रणदीप सुरजेवाला जहां पार्टी हाईकमान में मजबूती रखते हैं, वहीं जेपी जमीनी स्तर पर मजबूत कार्यकर्ता रखते हैं. आखिर देवीलाल स्कूल से निकले जेपी मंजे हुए खिलाड़ी हैं और मैन पॉवर के मामले में वो आज भी इनेलो की तकनीक अपनाते हैं। जहां कार्यकर्ता और नेता के बीच संवाद व आत्मीयता का रिश्ता सबसे अहम् होता है। वहां बिचौलिए नहीं बल्कि नेता और कार्यकर्ता सीधे रू-ब-रू होते हैं।

रणदीप सुरजेवाला कद से साथ बढ़ा रहे हैं अपना जनाधार

रणदीप सुरजेवाला पार्टी के भीतर अपने कद को बढ़ाने के साथ अब हरियाणा में अपनी राजनीतिक जमीन को विस्तार दे रहे हैं। वे कैथल, जींद, कुरुक्षेत्र और करनाल तक अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रयासरत दिख रहे हैं। जिसके चलते उन्होंने कुरुक्षेत्र में ब्राह्मण सम्मेलन में शिरकत भी की थी।

रणदीप सिह सुरजेवाला मुख्य मन्त्री पद की लडाई लड़ रहे हैं वे भी चाहते है कि जिस तरह रोहतक, सोनीपत व झज्जर में भूपेन्द्र सिंह हुड्डा का प्रभाव है वैसे ही उनका कैथल, कुरूक्षेत्र, करनाल व जीदं मे हो और कोई नेता कवाब में हड्डी न बनें।

दूसरी तरफ जयप्रकाश जो राजनीति के मजें हुए खिलाड़ी हैं, इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि सुरजेवाला की आज कांग्रेस में तूती बोल रही है। ये दोनों मिलकर एक ऐसा नया खेल खेल सकते हैं जिससे कैथल और जींद मे इनेलो को बडा झटका लग सकता है। जयप्रकाश कांग्रेस की मुख्यधारा में वापसी कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें भी अपना कद बढ़ने की संभावनाएं नजर आने लगी हैं। जिस तरह हुड्डा के नजदीकियों की बढ़ गई थी, ठीक उसी तरह रणदीप सुरजेवाला के मुख्यमंत्री बनने पर जेपी का कद बढ़ना लगभग तय है।

दुश्मनी दोस्ती में बदल गई

जयप्रकाश और रणदीप सुरजेवाला में लंबे समय तक राजनीतिक दुश्मनी रही है। पहली बार ये दोनों नेता 1996 में नरवाना विधानसभा चुनाव में आमने-सामने हुए थे। इस चुनाव में कांग्रेस से रणदीप, लोकदल से ओमप्रकाश चौटाला और बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी से जयप्रकाश उम्मीदवार था। प्रदेश के सबसे चर्चित इस चुनाव में रणदीप ने 849 वोटों से जेपी को हराया था। रणदीप को 28286 और जेपी को 27437 वोट मिले थे। चौटाला 25783 वोट लेकर तीसरे नंबर पर रहे थे।

इस चुनाव के बाद रणदीप व जेपी में ठनी रही। बाद में जेपी ने हविपा से अलग होकर हरियाणा गण परिषद भी बना ली थी। 1999 में जेपी को बीरेंद्र सिंह का साथ मिला और वह कांग्रेस में शामिल हो गए। तब बीरेंद्र ने जयप्रकाश के जरिए सुरजेवाला पर खूब निशाने साधे। 2000 में जयप्रकाश कांग्रेस की टिकट पर बरवाला से विधायक बने। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में रणदीप सुरजेवाला हिसार संसदीय क्षेत्र से टिकट लेना चाहते थे। लेकिन बीरेंद्र सिंह और केंद्र में कांग्रेस के पुराने नेताओं के सहयोग से जेपी टिकट लेने में कामयाब हो गए। इसके बाद जेपी और रणदीप में राजनीतिक टकराव और ज्यादा बढ़ गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि 2009 के चुनाव में रणदीप ने जेपी को जींद और कैथल के किसी भी हलके से टिकट नहीं लेने दी और उन्हें भजनलाल के गढ़ आदमपुर जाने के लिए मजबूर कर दिया। इस चुनाव में हजकां के कुलदीप बिश्नोई ने जेपी को 6015 वोटों से हराया। जेपी को 42209 वोट मिले थे। अगले 2014 के चुनाव में जयप्रकाश अपने गृहक्षेत्र कलायत से कांग्रेस की टिकट चाहते थे। लेकिन रणदीप ने हाईकमान में अपनी पैठ के चलते उन्हें टिकट नहीं लेने दी और जेपी को मजबूर होकर कलायत से निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा। जेपी ने इनेलो के रामपाल माजरा को हराकर शानदार जीत हासिल की। अब जयप्रकाश दोबारा कांग्रेस में वापसी चाहते थे, लेकिन कांग्रेस की नौ सदस्यीय कोर कमेटी में शामिल हो चुके रणदीप के समर्थन के बिना उनकी इंट्री मुश्किल थी। चर्चाएं तो यहां तक चल रही हैं कि रामपाल माजरा भी जल्दी ही कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं। हालांकि इसकी संभावनाएं कम ही नजर आ रही हैं। परंतु राजनीति में कब-कौन किधर चला जाए, यह कहा नहीं जा सकता।

सीएम पद की दावेदारी में बाधा नहीं सहायक बनेंगे जेपी

वहीं, खुद को भावी सीएम के तौर पर पेश कर रहे रणदीप को जयप्रकाश जैसे कद्दावर नेता की जरूरत थी। सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि रणदीप सुरजेवाला कुरुक्षेत्र संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। इसलिए दोनों नेताओं ने एक मंच पर आना मुनासिब समझा। इन दोनों की एकजुटता से जींद जिले की राजनीति पर भी असर पड़ेगा। रणदीप और जेपी दोनों की कर्मभूमि जींद जिला ही रहा है। जिले के सभी पांचों हलकों में दोनों नेताओं का अच्छा खासा प्रभाव है।

दोनों नेताओं का मिलन कितना लंबा चलता है और राजनीति के शतरंज में पार्टी के भीतर और बाहर के शह और मात के खेल में इन दोनों नेताओं की जुगलबंदी क्या रंग लाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।

 


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