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नया हरियाणा

बुधवार, 21 नवंबर 2018

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जींद उपचुनाव लिखेगा हरियाणा की राजनीति की नई पटकथा

जींद में होगी इनेलो, कांग्रेस और भाजपा तीनों दलों की असली परीक्षा.

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5 सितंबर 2018

प्रदीप डबास

पिछले महीने में जींद से इनेलो विधायक हरिचंद मिढा का निधन हो गया। हरिचंद मिढा एक राजनेता के साथ-साथ समाजसेवी के तौर पर पहचाने जाते थे। विधायक होने के बावजूद वे खुद मरीजों को देखते थे, लेकिन उनके निधन के बाद राजनीतिक पार्टियों के लिए एक मर्ज जरूर खड़ा हो गया है और वो मर्ज है उपचुनावों का। कभी सूबे की राजनीतिक राजधानी माने जाने वाले जींद जिले की ये सीट अब इनेलो, कांग्रेस और सत्ताधारी दल बीजेपी के लिए नाक का सवाल बनने वाली है.
जींद उपचुनाव में होगी मनोहर लाल की परीक्षा
सूबे में चुनावी समर से पहले होगा एक और रण. मतलब उपचुनाव. क्या सियासी दलों ने रचने शुरू कर दिए अपने-अपने चक्रव्यू? जींद विधानसभा सीट पर जो उप-चुनाव होगा उसमें किस पार्टी और नेता की उड़ेगी नींद?
जी हां 2014 में अपने दम पर सत्ता में आई बीजेपी के लिए पहली अग्नि परीक्षा देने का वक्त शायद नजदीक आ गया है। परीक्षा इनेलो की शायद उससे भी ज्यादा ‘करड़ी’ होने जा रही है और कांग्रेस भी सीट को हासिल करने के लिए क्या जान नहीं लगा देगी? ये वक्त सियासी मोहरों को फिट बैठाने का है....ये वक्त हर कदम को फूंक-फूंककर रखने का है, क्योंकि ये वक्त बनने वाला है सियासी दलों के लिए नाक का सवाल....जींद से इनेलो विधायक हरिचंद मीढ़ा के निधन के बाद खाली हुई इस विधानसभा सीट पर उप चुनावों भी होने हैं....अगर लोकसभा और विधानसभा चुनावों के एक साथ होने की संभावनाओं को अलग हटाकर देखें तो ये चुनाव राजस्थान समेत चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ ही करवाए जाने की पूरी संभावना दिख रही है।
जींद विधानसभा क्षेत्र के मतदाता राजनीतिक तौर पर हमेशा जागरुक रहे हैं। उन्होंने यहां लोकदल से विधायक बनाए तो कांग्रेस को भी लगभग बराबर का मौका दिया. वहीं जब बंसीलाल ने हरियाणा विकास पार्टी बनाई तो उन्हें भी मौका दिया....मांगेराम गुप्ता ने यहां से कुल आठ चुनाव लड़े जिनमें से चार बार वो विधानसभा भी पहुंचे। पिछली दो बार से ये सीट इनेलो के खाते में है। हरिचंद मिड्डा यहां से 2009 में विधायक बने और 2014 में भी उन्होंने ये सीट इनेलो के लिए बरकरार रखी।
ये सब कुछ तो किताबों और आंकड़ों में दर्ज है लेकिन अब तो सवाल उन बातों का है जो दर्ज होने वाली हैं....मतलब जब कांग्रेस और इनेलो दमखम दिखाने के लिए मैदान में आएंगी तो बीजेपी के लिए ये घड़ी और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी क्योंकि सत्ता में होने की वजह से बीजेपी भी चाहेगी कि किसी भी सूरत में उपचुनाव में जीत दर्ज की जाए....क्योंकि ये उपचुनाव 2019 का सेमीफाइनल भी समझा जाएगा....ये बताएगा प्रदेश में जनता का मूड किस दल की तरफ झुका हुआ है.
सवाल ये उठता है कि तमाम पार्टियां किस चेहरे पर दांव लगा सकती हैं....कौन फाइट में बने रहने की ताकत रखता है....कौन किस का खेवनहार होगा....ये सारे सवाल मायने रखते हैं....सबसे पहले बात बीजेपी की करते हैं...सवाल ये है कि क्या एक बार फिर से सुरेंद्र बरवाला ही यहां पार्टी का चेहरा होंगे...वो दो बार सांसद रहे हैं और एक बार विधायक.... 2014 में इनेलो से टिकट नहीं मिलने की वजह से कमल के साथ आ गए थे....या फिर बीजेपी के हाथ कोई और तुरुप का इक्का लग गया है....क्योंकि हम राजनीति के भीतर की बात आप तक पहुंचाते हैं. इसलिए बता देते हैं कि चर्चाएं ये भी चल रही हैं कि हरिचंद मिड्डा के बेटे कृष्ण मिड्डा की पिछले दिनों मुख्यमंत्री मनोहरलाल से मुलाकात भी हुई है.....अब सियासी मुलाकातों के मायने निकालने जरूरी हो जाते हैं.....मतलब क्या ये कहा जाए कि बीजेपी ने इनेलो विधायक के बेटे पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं....
ये तो तय है कि जींद उपचुनाव अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले की बड़ी और कड़ी परीक्षा है और सत्ताधारी बीजेपी के लिए तो ये नाक का सवाल होगी....ऐसे में मायने ये भी रखता है चौधरी बीरेंद्र सिंह और मुख्यमंत्री मनोहरलाल की जोड़ी यहां कैसे काम करती है...क्योंकि इज्जत का सवाल तो यहां चौधरी बीरेंद्र सिंह के लिए भी होगा ही ना.
बात कांग्रेस की भी होनी ही चाहिए....तो यहां सबसे पहला सवाल ये कि इस दल में टिकट बांटने को लेकर किसकी चलेगी....अगर पार्टी के प्रदेश में मुखिया अशोक तंवर की चली तो इस बात की संभावना भी पूरी है कि पार्टी एक बार फिर से अपने पिछली बार के उम्मीदवार प्रमोद सहवाग पर ही दांव लगाए....वैसे पिछले चुनावों में उनकी हालत भी कुछ ज्यादा अच्छी नहीं रही थी और उन्हें कुल साढ़े 12 फीसदी के आसपास ही वोट मिले थे...ऐसे में पार्टी क्या किसी और चेहरे भी विचार कर सकती है..
सबसे बड़ी दुविधा तो इनेलो के लिए खड़ी हो सकती है.....आखिर दो बार की जीती हुई सीट पर टिकट किसे दी जाए.....सवाल ये है कि हरिचंद मिड्डा के बेटे से अगर मुख्यमंत्री की मुलाकात के कुछ मायने निकाले जा रहे हैं तो अंदर की खबर ये भी है कि कृष्ण मिड्डा के सीएम से मुलाकात की वजह से परिवार के अन्य लोग ज्यादा खुश भी नहीं हैं....अगर ऐसा है तो क्या एक ही परिवार से दो लोग अलग-अलग पार्टियों से आमने-सामने होंगे....सवाल तो है.
जाहिर इन सभी सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में छुपे हैं, पर रोमांचकता ही राजनीति की खूबसूरती मानी जाती है. राजनीति में जब तक कयास लगते रहेंगे तब तक राजनीति के प्रति उत्साह और रोचकता यूं ही बरकरार रहेगी. ये कयास किसी दल के कार्यकर्ताओं में गुदगुदी पैदा करते हैं तो किसी के भीतर की बेचैनी को बढ़ा देते हैं.
 


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