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शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

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तुर्की की गड़बड़ाती अर्थव्यवस्था में अमेरिका का धार्मिक और आर्थिक हस्तक्षेप

इन दोनों के खराब संबंधों का असर भारतीय रुपए पर भी पड़ रहा है.

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27 अगस्त 2018

मेनका चौधरी

तुर्की, वो देश जो ना सिर्फ nato यानी नार्थ एटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन का मेम्बर है बल्कि ये देश पूरे मिडल ईस्ट के सबसे ताकतवर देशों में से एक है। इसी के साथ टर्किश इकॉनमी दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थ व्यवस्थाओं में से एक होने के साथ पूरे यूरोप में छठे नंबर पे आती है।
लेकिन इसके बावजूद भी,पिछले कुछ दिनों में टर्किश करंसी की वैल्यू यूएस डॉलर के सामने ना सिर्फ 25% से घटी है बल्कि आज की तारीख में जो कुछ भी हो रहा है वो टर्किश इकॉनमी के लिये किसी डिज़ाज़टर से कम नहीं है,और सबसे बड़ी बात तुर्की में यह इकॉनमी क्राइसिस आया नहीं है, बल्कि पैदा हुआ है उस कॉन्फ्लिक्ट की वजह से जो इस वक़्त अमेरिका और टर्की के बीच में चल रहा है। दरअसल राजनीति में धर्म की धुसपैठ सदा से रही है और अर्थतंत्र के माध्यम से दबाव बनाने की पुरानी रिवायत चलती आ रही है।
यूएस और तुर्की के बिगड़ते संबंधों की शुरुवात होती है आज से 2 साल पहले यानी जुलाई 2016 के उस दिन जब तुर्की की राजधानी अंकारा और सबसे पॉपुलेशन वाली सिटी इस्तांबुल में तुर्की के मौजूदा राष्ट्रपति एर्डोगन का तख्ता पलट करने की कोशिश की गई, क्योंकि उस कोशिश के नाकाम होने के साथ ही, एर्डोगन ने अपने खिलाफ साजिश का आरोप लगाते हुए ना सिर्फ बेहिसाब लोगों के ऊपर कार्यवाही की, बल्कि उन्हीं बेहिसाब लोगों में से एक इंसान था एंड्रीयू ब्रूनसं और सही मायने में यह ब्रूनसं ही है जिसकी गिरफ्तारी होने के साथ ही यूएस और तुर्की के बिगड़ते रिश्तों की शुरुवात हुई।
और आज यह दोनों ही देश एक दूसरे की अक्ल ठिकाने लगाने की बात कर रहे हैं, जहाँ एक तरफ ट्रंप ने ब्रूनसं के सप्पोर्ट में ट्वीट किया, वहीं अमेरिका में तुर्की से आने वाले स्टील और अलुमिनियम पर लगने वाले टैरिफ को डबल करते हुए तुर्की के एक्सपोर्ट को सीधे तौर पर नुकसान पहुँचाने की कोशिश की है और इसी का नतीजा है कि 2018 में तुर्किश करंसी की वैल्यू 45% कम होने के साथ-साथ पिछले कुछ दिनों में 25% घटी है। वहीं दूसरी ओर एर्डोगन ने अपने लोगों से अमेरिकी प्रोडक्ट और अमेरिकी सर्विसेस का बॉयकॉट करने की अपील की है।
कौन है ब्रूनसं और क्यों अमेरिका कर रहा है पैरवी
कुछ बातें ब्रूनसं के बारे में भी पता होनी चाहिए। जैसे ब्रूनसं असल में एक अमेरिकी क्रिश्चियन पादरी हैं, जो कई साल से क्रिश्चियन मिशनरी के अंतर्गत तुर्की में काम कर रहे हैं। और जिसे अक्टूबर 2016 में तुर्की के अंदर तख्ता पलट करने की कोशिश करने के इल्ज़ाम में टर्किश आर्मी के उन हज़ारो आर्मी ऑफिसर्स के साथ में गिरफ्तार किया गया, जो कि इस पूरे कांड में शामिल थे।
ब्रूनसं की गिरफ्तारी के एक साल बाद 2017 को एर्डोगन ने अमेरिका के सामने एक ऑफर रखा। जिसके तहत वो ब्रूनसं को इस शर्त के साथ छोड़ने के लिये तैयार हो गए कि बदले में यूएस उस टर्किश सिटिज़न को फिर से टर्की को सौंपेगा। जिसने इतने दिनों तक यूएस के अंदर शरण ले रखी थी और जिसका नाम है फैतुल्ला गुल, क्योंकि एर्डोगन के हसाब से 2016 में तुर्की के अंदर हुई तख्ता पलट की कोशिश के पीछे गुल ही था।
2017 में एर्डोगन के इस ऑफर को यूएस ने ठुकरा दिया। फैतुल्ला गुल टर्की में चल रहे उस सोशल मूवमेंट के लीडर हैं, जो सबको शिक्षा का अधिकार, सिविल राइट्स और शांति स्थापित करने की बात करती है और उस मूवमेंट का नाम है गुल मूवमेंट। अब ऑफर ठुकराने के बाद 2017 में ब्रूनसं के ऊपर भी वो तमाम चार्जेज लगा दिए गए जो कि बाकी आरोपियों पर लगाए गए थे।
इतना ही नही, तुर्की के अंदर ब्रूनसं के अलावा तीन अमेरिकी नागरिक और हैं। जिन पर भी सेम चार्जेस के तहत गिरफ्तार किया गया। वो हैं स्माइल कुल, मुस्तफा कुल और सरकन गोल्ग,जो कि नासा के साइंटिस्ट थे।

मई 2018 में ब्रूनसं केस की सुनवाई शुरू होने के साथ ही यह बात पूरी तरीके से साफ हो गई कि टर्किश सरकार ब्रूनसं के साथ में क्या करने वाली है। क्योंकि कोर्ट में उसकी सुनवाई के दौरान ना तो अदालत ने उसके किसी भी गवाह की गवाही सुनी और ना ही उसके बेगुनाह होने वाले किसी भी सबूत को रखने का मौका दिया। अब ब्रूनसं क्योंकि एक क्रिस्चियन पादरी है इसलिए ट्रंप के ऊपर ना सिर्फ वेटिकन बल्कि यूएस की उस कंज़र्वेटिव क्रिश्चियन कम्युनिटी का भी दबाव है जो कि ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन के कोर वोटर हैं।
इसीलिये ट्रंप ने तुर्की के ऊपर ना सिर्फ इकॉनमी प्रेशर बनाना शुरू किया,बल्कि इस का नतीजा यह निकला कि टर्की के अंदर आज तक फाइनेंशियल क्राईसिस खड़ा हो गया है।
सीरिया वॉर भी एक कारण है
इनके बिगड़ते संबंधो के पीछे एक कारण सीरिया वॉर भी है। 2011 में जब सीरिया के अंदर कॉन्फ्लिक्ट शुरू हुआ तब तुर्की और यूएस एक ही टीम में थे, लेकिन 2014 में जैसे ही आइसिस ने सीरिया के अंदर कदम रखा समस्या शुरू हो गई, क्योंकि आइसिस के सीरिया में आने के साथ ही सीरिया के उत्तरी भाग में मौजूद कुर्दिश लड़ाकों ने ना सिर्फ आइसिस के खिलाफ हथियार उठाए, बल्कि उस वक़्त यूएस के पास सीरिया के अंदर आइसिस के खिलाफ खड़ा करने के लिये कुर्दिश लड़ाकों के अलावा कोई भी नहीं था, क्योंकि ओबामा ने इस बात की घोषणा पहले ही कर दी थी कि यूएस किसी भी हालत में सीरिया के अंदर अपने ग्राउंड ट्रुप्स नहीं उतारेगा। और चाहे जितना हवाई हमला किया जाए युद्ध में जीत उसी की होती है जिसकी थल सेना मजबूत हो, और यही कारण है कि सऊदी के हवाई हमलों के बाद भी यमन में मौजूद हौदी रिबेल्स धूल चटा रहे हैं उन्हें।
अब चूंकि उस समय कुर्दिश लड़ाके सीरिया के अंदर आइसिस से लड़ रहे थे इसलिए यूएस ने कुर्दिश लड़ाकों को ना सिर्फ दुनिया के सबसे बेहतरीन हथियार दिए बल्कि सीरिया वॉर के दौरान अमेरिका ने कुर्दिश लड़ाकों को एयर सपोर्ट भी दिया। और असल में सीरिया के अंदर यूएस द्वारा कुर्दिश लड़ाकों को किया गया यही सपोर्ट आज की तारीख में यूएस और तुर्की के बिगड़ते संबंधों का कारण बन गया है।

क्योंकि असल में कुर्दिश लड़ाके कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (pkk) को सपोर्ट करते हैं, जो कि तुर्की और इराक के अंदर साल 1984 से काम कर रहे हैं। और जो शुरूवात से ही एक अलग देश कुर्दिस्तान की मांग कर रही है। और अगर ऐसा होता है तो फिर कुर्दिस्तान बनने के चक्कर में तुर्की का एक बहुत बड़ा हिस्सा जाएगा। ब्रूनसं के ऊपर लगाए गए चार्जेस में से एक आरोप यह भी है कि वो pkk को सपोर्ट करता है।
अब इसी भसड़ की वजह से तुर्की रशिया के सपोर्ट में खड़ा हो गया। जिसके फाइटर जेट को टर्किश आर्मी ने ही सीरियन कॉन्फ्लिक्ट के शुरुवात में गिराया था। आज की तारीख में तुर्की ना सिर्फ रशिया को सपोर्ट कर रहा है, बल्कि उसने रशिया से S400 समेत कई वेपन सिस्टम भी खरीदने की कोशिश की है। इसलिए यूएस ने तुर्की के ऊपर किसी भी देश से हथियार ना खरीदने वाले वही प्रतिबंध फिर से लगा दिए जो कि 1992 में उस वक़्त लगाए गए थे जब सोवियत यूनियन टूटा था।
इन सब वजहों से तुर्की करंसी की हालत दिन पर दिन पतली होती जा रही है। जिसका इफ़ेक्ट बाकी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। और भारत के रुपए के गिरने के पीछे भी संबंध जोड़े जा रहे हैं। आगे स्थिति और गंभीर हो सकती है अगर तुर्की में हालात जल्द ना संभले तो।
 


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