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नया हरियाणा

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

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गए  बख्त इब  नहीं  मिलण  के  टेम  बोहड़  कै आवै  ना

जो समय बीत गया वो वापिस नहीं आएगा. पर उसके चले जाने के साथ-साथ क्या चला जाता है, यही इस गीत का मर्म है. जिसमें पीड़ा साफ झलकती है.

The time passed will not come back, naya haryana

28 नवंबर 2017

 सुनीता  करोथवाल

सुनीता करोथवाल चांग गांव(हरियाणा) की बेटी हैं. जो हरियाणवी संस्कृति से जुड़े लोकरंगों को अपनी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करती हैं. जिसमें परंपरा और आधुनिकता का संतुलन निरंतर बना रहता है और अपने देहाती लहजे में वो समय के साथ खोते हुए मूल्यों को लेकर सचेत हैं. जिसकी पीड़ा उनकी रचनाओं में साफ झलकती है. उनकी रचनाओं के प्रेरणा स्रोत हरियाणा विज्ञान मंच के सदस्य और पूर्व प्रिंसिपल वेदप्रिय जी हैं. प्रस्तुत है आपके सम्मुख उनकी ये बेहतरीन रचना-

 

गए  बख्त  इब  नहीं  मिलण के  
टेम  बोहड़ कै आवै  ना 
आया  सामण  झाल  उठरी 
माँ,नींद  रात नै  आवै  ना..

कितणा  आच्छया  बख्त  था माँ 
तूं  साथ  रया  करदी 
गामां  बरगे  ठाठ  नहीं 
तूं  रोज कया  करदी..

कुरते  ऊपर  ना रही  गलसरी 
झूल  रही  ना सामण  की  
फूलां  आली  जूती  ऊपर 
कली  रही  ना दामण  की ।

पैंडी  टूटी  ,खूंटी  पाटगी 
प्याण  खू  गए  हारे  के  
भेल्ली भीतर  पाया  करदे 
खूगे  नाज  बुखारे  के...

घर घर पाया  करदी  पसेरी 
छीणी  और कमाणी  मिटगे 
काला  तेल लगांदी नानी 
चरख्यां  के वे ताकू  छूटगे...

काची  छांगणी  शहतूतां  की 
रोटियाँ  के बोइए  फूकगे 
छाबड़ियाँ  मैं  झूलदे  टाबर 
कड़ियाँ  के वे  कुंदे  टुटगे...

दो जोड़ी  बलदां  के रहड़ू पै 
ट्रैक्टर आले  हर्रो  फिरगे 
हाली  की तो बात  करो  ना 
सारे  हल चूल्हे  मैं जलगे...

कापण,पलिये और सुराही 
घर घर पाया  करदे
डाभ की बुहारी  बणदी 
आंगण  मैं  खाट  लगाया  करदे...

खेत  के कोठड़े  बी पक्के  होगे 
इब सिर पैर छ्यान  सुहावै  ना 
गए  बख्त इब  नहीं  मिलण  के 
टेम  बोहड़  कै आवै  ना ।
             

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