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म्हारे गाम के पुराणे घर आळी काळी रसोई

सुनीता करोथवाल ने पुराणे घर वाली काळी रसोई के शरीर और आत्मा दोनों का मार्मिक चित्रण किया है.

Mare Gaam ke Purane ghar aali kali rasoi, naya haryana

27 नवंबर 2017

सुनीता करोथवाल

बचपन की यादों से

"एक थी  काळी  रसोई"
सारा  कुनबा  रात नै आठ  बजे  टी.वी. देखण  म्हं  बीजी  होरया। मैं आपणी  रोटियाँ  की  तैयारी  कर रह्यी। पीछे  न आर. ओ. की आवाज आर आगै न धुम्मा फैंकण आळा  पंखा  चाल रह्या। रसोई  तै बाहर न फ्रीज  की आवाज आवै । रात  होगी , पर इस शहर  म्हं, घर न बी  शांति  नहीं। किमे  गुस्सा आया, किमे उदास  होयी। वे दिन याद आगे  जिब म्हारे गाम के  पुराणे घर म्हं एक काळी  रसोई  थी।
पीळी  माटी  तै  पुताई करया होया माटी  का चूल्हा, रसोई  की कूण  म्हं  दो हारे, छांत  पै  चिमनी के  नाम  तै एक मोखा । जिसके  मुँह  तै  काळा धुम्मा  लिकड़या  करता। कई  सालां  पुराणी रसोई  के भीतर ,भीत आर  कड़ी, कती  काळी  होयी  रह्या  करती। पर ,इस बात तै  किसे  न कोये फर्क नहीं  पड्या  करता। 
    
रसोई  के बाहर एक सिलबट्टा धरा  रह्या  करदा। एक लाकड़ी  की मसाल  दानी, जिसमैं  मोटी नूण  की डळी,साबत  हल्दी,साबुत लाल  मिर्च और जीरा ,धनिया  होया  करदा। दादी  जद बी  साग बणांदी, पहले  पत्थर प नूण , मिर्च ,हल्दी रगड़दी। फेर पीतळ  की डेगची  म्हं आलू  का साग छोंकदी। वो  साग आर बाजरे  की खिचड़ी  की रोटी  ,दुनिया  के  किसे फाइव स्टार  म्हं  नहीं  मिलै। 
फेर बाबा आंदे  रसोई  कै  भीतर एक ओड़ न दरी  बिछांदे,देहळी  कै बाहर रेत  की भरी  जूती  काढदे। मैं  पीतळ  के लोटे  म्हं  पाणी  भरकैं धरदी। दादी  बाबा  की रोटी  पै घणा  सारा घी धरदी। हाम सारे बाहण भाई  बाबा की थाली  म्हं  न्यू  लाग  जांदे,जणू  किसे  कुतिया  के भूखे  बच्चे  एकदम तै आपणी  माँ  कै दूध  पीण  लाग  जाया  करैं। दही  के बडे कचोळे  म्हं  बाबा  की बड़ी  बड़ी  मूँछ डूब जाया  करदी। हाम बाबा  का खूब  मजाक उडांदे। बाबा  गेल फेर  दही  पीकैं आपणी  बी मूँछ  बणांदे। दादी  रोज  छोह  म्हं आंदी। के  न्यारी घाल  कै  रोटी खा ल्यो। पर बाबा  की रोटियाँ  की पापड़ी,घी शक्कर आर दही  ,फेर दूध  की मळाई खाण  का आनंद ऐ न्यारा था। 
   
वा  रसोई  काळी थी  पर उसका भीतर बहोत धोळा था। छोटी थी,  पर सारे  कुनबे  न आपणी छाती  कै  ला लिया  करती। उस  रसोई  न सारा  कुनबा  बाँध  कै  राख्या  ।बनाण आळी  न तसल्ली  होया  करदी। रोटी  बनाण  का न्यारा ए मजा आया  करता। वे  हथेली के स्पर्श  जिसनै हाथ की रोटी  कह्या  करदे। वे  रायते  म्हं ढुंगार  जिसनै आज काल स्मॉक फ्लेवर  कहवैं  सैं  और  वे  टिंडी घी  जिसनै बाळक  बटर  कहवैं  सै। ये एक दिन हरियाणा  के बाळक किताबां म्हं  पढैंगे। खुरचन और गौजी एक दिन फाईव  स्टार  म्हं खावैंगे। क्यूँ,हामनै  तो  सबकुछ  छोड़  दिया। हमनै  काम करणा  पसंद  नहीं। फेसबुक  पै  मित्र  बणाना पसंद  सै  पर कुनबे  कै  साथ  रोटी  खाण  का रिवाज  तो  बंद  ए हो  जावैगा। जिंदगी  बाळकां ,कुनबे की हँसी ठिठोली म्हं नहीं, बस रसोई म्हं लागदी सीटी, दीवार म्हं लागे अग्जोस्ट फैन, कूण म्हं खड़े फ्रीज और पाणी आळे आर.ओ. घर्र -घर्र म्हं बिंध कै रह जयागी.

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