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नया हरियाणा

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

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अभय सिंह संगठन और दुष्यंत 'वानरों' के भरोसे ठोंक रहे हैं इनेलो पर दावेदारी

इनेलो के भीतर चल रही उठापठक किस दिशा में जा रही है.

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9 अगस्त 2018

नया हरियाणा

तैयारियों के दौरान अलग रहे नेता प्रतिपक्ष अभय चौटाला इनसो के 16वें स्थापना दिवस पर अनाजमंडी में हुए युवा छात्र अधिकार रैली में दोनों बेटों करण व अर्जुन चौटाला के साथ पहुंचकर सबको हैरान कर दिया था। उनके जाने से जहां बाहरी तौर पर इनेलो में एकजुटता झलकी थी। उसे मंच से ही तार-तार कर दिया गया था.
 हालांकि रैली संयोजक दिग्विजय सिंह, मुख्य वक्ता दुष्यंत चौटाला ने अपने चचेरे भाइयों के साथ मिलकर एकजुट होने का एलान भी किया था। परंतु चाचा की मौजूदगी में सांसद दुष्यंत चौटाला ने कहा था कि- हमने तो ओमप्रकाश चौटाला व डॉ. अजय सिंह चौटाला को राम माना है। आप वानर सेना की तरह चंडीगढ़ तक जाने का रास्ता बनाओ ताकि 2019 में ओमप्रकाश चौटाला को सीएम की कुर्सी पर बैठा सकें। 
दूसरी तरफ प्रायोजित कार्यकर्ताओं ने दुष्यंत आप आगे बढ़ो, हम आपके साथ के नारे लगाए। मंच से दिग्विजय समेत कई नेताओं ने दुष्यंत चौटाला को युवाओं का नेता बताया। जबकि उसी मंच पर करण और अर्जुन चौटाला भी मौजूद थे।
पार्टी के भीतर के अंतर्विरोध विभिन्न मंचों से साफ झलकते रहे हैं। अभय सिंह चौटाला जहां संगठन के भीतर अपनी मजबूती के कारण दावेदारी ठोंकते हैं, वहीं दुष्यंत वानरों (युवाओ) के भरोसे पार्टी की कमान अपने हाथ में लेना चाहते हैं। देखना अब यह होगा कि जीत संगठन की होगी या वानरों की।
अभय सिंह चौटाला दुष्यंत चौटाला के मुकाबले में खासकर मीडिया और सोशल मीडिया को मैनेज करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। वहीं दुष्यंत चौटाला सधी हुई राजनीतिक चालों से मीडिया और सोशल मीडिया पर खुद को युवा नेता के तौर पर मजबूती से परोस रहे हैं। जिसका फायदा उन्हें पार्टी के भीतर दावेदारी का ज्यादा मिल रहा है। अभय सिंह चौटाला की रणनीति से साफ लगता है कि वो सोशल मीडिया की ताकत बहुत कम आंक रहे हैं या किसी अवसर की तलाश में बैठे हैं। कार्यकर्ताओं में जमीनी स्तर पर हलचल पैदा करने में भले ही वो एसवाईएल के जरिए कामयाब हो रहे हों, परंतु छवि निर्माण के कार्य में वो अभी 90 के दशक में जी रहे हैं।

चाचा-भतीजे के बीच सत्ता को लेकर संघर्ष गाहे-ब-गाहे झलकता रहा है। यह संघर्ष इनेलो की दशा और दिशा दोनों को तय करने में काफी निर्णायक साबित होगा। इसलिए राजनीति के जानकारों के लिए इन दोनों की राजनीतिक सूझबूझ और रणनीतियों का समय-समय पर आकलन करना जरूरी है। मीडिया के सामने इस संघर्ष को भले ही नकार दिया जाता हो, पर इस हकीकत का सामना पार्टी के भीतर मौजूद इन दोनों नेताओं के नजदीकी खूब महसूस कर रहे हैं। साथ में नेतृत्व के बदलने के साथ उनकी स्थितियां बदलने में भी देर नहीं लगेगी।

इनेलो के भीतर और बाहर पल-पल बदल रहे हालातों पर पैनी नजर रखने पर ही इस उधेड़बुन को समझा जा सकता है।


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