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नया हरियाणा

गुरूवार, 19 अप्रैल 2018

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स्त्रियों की भागीदारी और सही मायने में समाज में मौजूदगी

अभी स्त्रियों को उच्च शिक्षा, खेल और समाज में बराबरी की भागीदारी लाने में समय लगेगा और हमें भी इस पर निरंतर अग्रसर रहना होगा. तभी एक सभ्य समाज और राष्ट्र की कल्पना कर सकते हैं. जिसमें सरकार और समाज दोनों को अहम् भूमिका निभानी पड़ेगी.

Women's involvement and truly presence in society, naya haryana, नया हरियाणा

27 नवंबर 2017

संजू सैनी

जहर हमेशा कड़वा ही हो ये जरूरी नहीं होता. कभी-कभी आपके स्वादानुसार भी इसे बनाया जा सकता है. इसे आप समाज की उस मानसिकता से जोड़कर समझ सकते हैं, जहां स्त्री को देवी कहा जाता है और उसी देवी को पैदा होने से पहले मार दिया जाता है, या तमाम तरह के शोषण, उत्पीड़न आदि का शिकार होना पड़ता है.  घर में लड़की पैदा होने पर उसे देवी कहकर पुकारने वाले भी हम ही थे और जब लालच और दिखावटी ज्ञान का प्रचार हुआ तो बेटी से कब वह बौझ बन गयी, इसे समझने में और इससे उपर उठने में हमें बहुत समय लग रहा है और अब भी इस दिशा में  हमें आगे बढ़ने की जरूरत है. एक समय था जब मैडिकल सुविधाएं बढ़ने लगी और विज्ञान प्रदेश में क्षेत्र-दर-क्षेत्र पैर फैल रहा था. आज कल ये आम कही जाने वाली बातें हैं कि तकनीक के फायदे हैं, तो नुकसान भी बराबर के हैं।

खैर अपनी बात पर आता हूं ठीक 1995-1996 में लड़कियों के जन्म पर  गिरावट आने लगी और इस पर इतना विषेश ध्यान  नहीं दिया गया. न आमजन और न ही किसी सरकार ने ठीक समझा. समय बीतने के साथ-साथ हरियाणा का लिंग अनुपात में इतनी विषमता आ गई और इस  समस्या ने विकराल रूप ले लिया. किसी ने ध्यान देना तक जरूरी नहीं समझा. प्रदेश के नियम और सरकारें बदलती रही, यहां तक की हरियाणा का लिंग अनुपात 847/1000 तक पहुंच गया, यानी 847 लड़कियों का जन्म वहीं1000 लड़के. पता नहीं सरकार जानती नहीं थी या  समझना नहीं चाहती थी या फिर बिल्ली के आगे आए कबूतर की तरह जान बूझकर आंखें बद करने की  कोशिश कर रही थी.

1 फरवरी 2003 को आई खबर से पहले तत्काल मुख्यमंत्री और अखबारों ने हरियाणा की बेटी कल्पना चावला को खूब जगह दी और दुर्घटना वश और हमारी बदकिस्मती से अंतरिक्ष में खोज के लिए निकली बेटी वापिस न आ सकी.  हरियाणा सरकार ने एक दिन का राजकीय शोक मना कर बेटी का कर्ज उतार दिया. वर्ष 2004 से लेकर 20013-14 तक मानो विकास की नदियां बहा दी हो प्रदेश सरकार ने, लेकिन शिक्षा के साथ हुए प्रयोग और किसानों की जमीन लेकर भोले-भाले लोगों को चकाचौंध में फंसाकर, महज मीठा जहर ही दिया. लच्छेदार भाषण, बेफिजूल के विज्ञापन और नंम्बर वन‌ बताए जाने वाले हरियाणा को जब सही रूप में मापदंड दिये गये तो वह बहुत से मानकों पर फेल ही‌ साबित हुए. पक्के रोड और आसमान छूती ज़मीन की कीमतें भी उसके साथ ही फेल हो चुकी थी. हरियाणा में प्रापर्टी को जो फर्जी बाजार खड़ा किया गया था, वह भी धीरे-धीरे धराशायी हो रहा था. कुछ डीलर आज भी इस मुगालते में हैं कि अगर हरियाणा में कांग्रेस की सरकार आई तो दोबार उसी तरह प्रोपर्टी में छक्के लगने शुरू होंगे. हरियाणा सरकार ने जिस तरह विज्ञापन और जागरूकता अभियान चलाये, वो केवल अभियान ही रहे. नियम और कानूनों से सरकार दूरी बनाए बैठी रही. लेकिन अब समय बदल गया था. अब बेटियां और इंतजार करने के मुड़ में नहीं थी. वो कर गुजरने के हौसले के साथ आगे बढ़ रही थी/ रही हैं. करारा थप्पड़ मारकर जगाया समाज और गहरी सोई हुई सरकार दोनों को.  हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति ही नहीं बल्कि अपना लोहा मनवाया प्रदेश की बेटियों ने.

वर्ष 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में हरियाणा की बेटियों गीता फोगाट, अनीता, कृष्णा पूनिया, सायना नेहवाल, निर्मला देवी, बबीता फोगाट, सुमन कूंण्डु, सीमा अंतिल आदि ने बिना किसी खास खेल नीति और खास सुविधाएं पाएं देश नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम दर्ज करवाया. हमें अपने होने का अहसास करवाया और उसके बाद कुछ सरकार और समाज को एहसास हुआ. ये सिर्फ खेल जगत के नाम हैं, बाकि के क्षेत्रों में भी इसी तरह मुकाम हासिल किए हुए हैं, जैसे हाल ही में विश्व सुंदरी बनी मानुषी छिल्लर, उच्च शिक्षा और मंनोरंजन, व्यवसाय में दिन पर दिन बढ़ते कदम सफलता की ओर है. समय के साथ-साथ समाज में जागरूकता तो आई ही है और उसके साथ-साथ मेडिकल विभाग और सरकार ने भी कड़े कानून बनाकर पैसे के लालच में भ्रूण हत्या, दहेज के लालच में उत्पीड़न, घर क्लेश कर मार पीट, बाल विवाह और जबरदस्ती विवाह जैसे मामलों में गिरावट आई है. समानता के पैमाने को नजर रखते हुए हर जिला मुख्यालय पर महिला थाना की शुरुआत, शायद देश में इस तरह की पहली शुरुआत है और जिसकी जरूरत थी विज्ञापन और जागरूकता अभियानों से निकल जमीनी स्तर पर काम होना शुरू हुआ है और पिछले कुछ ही वर्षों में लिंग अनुपात में बढ़ौतरी नजर भी आई है. नवजात बच्चों में  947/1000  मार्च 2017 का आंकड़ा है. हालांकि कई जगह सरकार की तरफ से गलत आंकड़े पेश करने के मामले भी उजागर हुए हैं.

लेकिन यह प्रर्याप्त नहीं होगा. अभी स्त्रियों को उच्च शिक्षा, खेल और समाज में बराबरी की भागीदारी लाने में समय लगेगा और हमें भी इस पर निरंतर अग्रसर रहना होगा. तभी एक सभ्य समाज और राष्ट्र की कल्पना कर सकते हैं. जिसमें सरकार और समाज दोनों को अहम् भूमिका निभानी पड़ेगी.

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