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बाप बड़ा ना रुपया, डॉलर का खेल समझ लो भैया

कैसे सिर्फ़ एक देश याने अमेरिका की करेंसी डॉलर, वर्ल्ड करेंसी में तब्दील हो गई।

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31 जुलाई 2018

मेनका चौधरी

अगर आपने ज़िंदगी में एक भी इंटरनेशनल ट्रांज़ेक्शन किया है तो आपको पता होगा,दुनिया में कोई भी ट्रांज़ेक्शन सिर्फ़ एक करेंसी में हो सकता है, और वह है डॉलर ($) इसी के साथ किसी भी देश की इकोनॉमिक कंडीशन की वैल्यूएशन करते हुए एक पॉइंट को सबसे ज़्यादा कंसीडर किया जाता है और वह यह कि उस देश के फॉरेन रिज़र्व के अंदर कितना डॉलर रखा हुआ है।

यह भी सच है कि आजकल कुछ येन और यूरो में भी ट्रांज़ेक्शन होते हैं,लेकिन लगभग 90 प्रतिशत अभी भी सिर्फ़ डॉलर में ही होते हैं, तो अब सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों और कैसे डॉलर इतना ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया और कैसे सिर्फ़ एक देश याने अमेरिका की करेंसी डॉलर, वर्ल्ड करेंसी में तब्दील हो गई।

डॉलर की वर्ल्ड करेंसी में तब्दील होने की कहानी शुरू होती है 1944 में,यही वह दौर था जब वर्ल्ड वॉर 2 ना सिर्फ़ अपने अंत पे चल रही थी बल्कि इस युद्ध की वजह से तकरीबन पूरी दुनिया तबाह हो चुकी थी,और लोगो के सामने यह सवाल खड़ा था कि युद्ध खत्म होने के बाद वह देश जो तबाह हो चुके हैं उनका रिडेवलपमेंट कैसे किया जाए।

और इसी सवाल का जवाब ढूँढने के मकसद से जुलाई,1944 में अमेरिका में एक सभा बुलाई गई,जिसमें 44 allied देशों के 730 डेलिगेट्स ने हिस्सा लिया और इस मीटिंग को पूरी दुनिया bretton woods conference के नाम से जानती है, इसी मीटिंग के दौरान IMF (international monetary fund) और वर्ल्ड बैंक जैसी ऑर्गेनाइज़ेशन बनाने जैसे कई फैसले लिए गए,उन्ही फैसलों में से एक फैसला था जो अमेरिका को बहुत ज़्यादा ताकतवर बनाने वाला था।

अब चूंकि सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान अमेरिका ही एकमात्र देश था जिसे ना सिर्फ़ सबसे कम नुकसान पहुँचा था,बल्कि अभी भी अमेरिकी इकोनॉमी पूरी दुनिया के अंदर सबसे अच्छी कंडीशन में थी,और अमेरिकी डॉलर ही एकमात्र ऐसी करेंसी बची थी जो रिलायबल और स्टेबल दोनों थी, इसीलिये ब्रिटेन के सपोर्ट की वजह से अमेरिकी डॉलर को वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ से होने वाले तमाम ट्रांज़ेक्शन के लिये कम्पलसरी करते हुए वर्ल्ड रिज़र्व करंसी के रूप में मान्यता दे दी गई और बदले में अमेरिका ने पूरी दुनिया से यह वादा किया कि वो ना सिर्फ अपने डॉलर की प्रिंटिंग को लिमिटेड रखेगा बल्कि कोई भी देश 35 डॉलर पर आउंस के फिक्स रेट पे अमेरिका से डॉलर के बदले में गोल्ड को एक्सचेंज कर सकती है।

अमेरिका उस समय और आज भी गोल्ड का सबसे बड़ा रिज़र्व है इसीलिए इतने बड़े तादात पे गोल्ड के बदले डॉलर का एक्सचेंज सिर्फ अमेरिका ही कर सकता था,इसी के साथ पूरी दुनिया के अंदर डॉलर को इंटरनेशनल ट्रेडस के लिये यूज़ किया जाने लगा,और इस सिस्टम को bretton woods system के नाम से जाना जाता है

लेकिन तभी 1955 से 1975 के बीच हुए वियेतनाम युद्ध के दौरान पूरी दुनिया को इस बात का अहसास हो गया कि अमेरिका ना सिर्फ अपने हिसाब से डॉलर को छाप रहा है बल्कि उसके फेडरल रिज़र्व ने दुनिया के तमाम देशों को अपने प्रिंटिंग प्रेस का ऑडिट करने से भी मना कर दिया और इसी के साथ अमेरिकी डॉलर की वैल्यू गिरना शुरू हुई।

इतना ही नही ठीक इसी समय जब 1971 में फ्रांस ने अमेरिका से डॉलर के बदले अपना गोल्ड वापस मांगा तो अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन ने पूरी बेशर्मी के साथ टी वी पर ना सिर्फ उस गोल्ड को देने से मना कर दिया ,बल्कि अगस्त 1971 को bretton wood सिस्टम को टेम्पररी रूप से सस्पेंड कर दिया और इसी के साथ पूरी दुनिया के लिए अमेरिकी डॉलर की वैल्यू ज़ीरो हो गई,लेकिन इस वक्त तक दुनिया के हर देश के पास अमेरिकी डॉलर न सिर्फ रिज़र्व के रूप में रखा था बल्कि अब रशिया और चाइना के पास भी अमेरिका की ही तरह परमाणु हथियार थे।

और इसलिए अमेरिका को इन डॉलर के बदले कुछ ना कुछ तो देना ही पड़ता, अब ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेरिकी डॉलर को इंटरनेशनल वैल्युएशन मिली थी फोकट में और पूरी दुनिया में एक और देश था जिसके पास फोकट का माल रखा हुआ था, और वह था सऊदी अरब,इसलिये अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन सऊदी अरब पहुँचे, और सऊदी के किंग फैज़ल को इस बात के लिये मना लिया कि वो पूरी दुनिया के अंदर अपना oil अमेरिकी डॉलर्स और बॉंडज़ के बदले में बेचे और बदले में अमेरिका सऊदी अरब की oil फील्ड्स को प्रोटेक्शन देगा, यही ऑफर तमाम opec (organization of petroleum exporting countries) नेशन्स को भी दिया गया

यही वह दौर था जब अरब वर्ल्ड इज़रायल से 6 दिनों के युद्ध में बुरी तरह से हार गया था,और अमेरिका अरब देशों को जो प्रोटेक्शन देने की बात कर रहा था उसका सीधा सीधा मतलब यह बनता था कि या तो अपना oil अमेरिकी डॉलर्स में बेचो या फिर एक और युद्ध के लिये तैयार रहो, और इसीलिए ये बेचारे जो कल तक अपना तेल गोल्ड के बदले में बेच रहे थे अब डॉलर के बदले बेचने के लिये तैयार हो गए,जिसकी उस वक्त तक ज़ीरो वैल्यू थी।

और इसी के साथ दुनिया में जन्म हुआ petrodollar का जिसने अमेरिका को ना सिर्फ ताकतवर बनाया बल्कि टेक्निकली तमाम अरब वर्ल्ड अमेरिका के हाथ के नीचे था,इस एक फैसले की वजह से अमेरिका को सबसे ज़्यादा फायदा हुआ क्योंकि वह अमेरिकी डॉलर जो बाकी देशों के पास रखा था और जिसकी वैल्यू ज़ीरो हो चुकी थी वो ना सिर्फ फिर से वैल्यूएबल बन गया बल्कि वो गोल्ड जो इससे पहले बाकी देशों ने अमेरिका को डॉलर लेने के बदले दिया था, अमेरिका उसे डकार गया।

अब ऐसा नही है कि अरब देशों को अपनी गलती का एहसास नही हुआ असल में इसके बाद 1973 में अरब इज़रायल के बीच हुए युद्ध के दौरान जब अमेरिका ने इज़रायल का सपोर्ट किया तो अरब देश समझ गए कि कोई बेवकूफ बना गया,लेकिन इसके बावजूद भी आज भी अरब नेशन्स अपना oil डॉलर के बदले में बेच रहे हैं,क्योंकि जब भी कोई इनमें से यह समझौता तोडने की सोचता है,तो उन्हें सद्दाम और गद्दाफी की तस्वीरों पर टंगे हार नज़र आ जाते हैं जिसकी वजह से उसकी हिम्मत जवाब दे जाती है, अमेरिका केवल यह चाहता है कि चुपचाप opec नेशन्स दुनिया के तमाम देशों को डॉलर के बदले तेल बेचते रहें ,और अमेरिकी डॉलर में ट्रेड करना दुनिया के तमाम देशों के लिये मजबूरी बना रहे।

मेनका चौधरी  (फेसबुक पर यहां जुड़ सकते हैं)


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