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नया हरियाणा

बुधवार, 20 नवंबर 2019

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इनेलो चली कांग्रेस की चाल

इनेलो की अगर यह रणनीति है तो यह रणनीति पार्टी को फायदा ही देगी.

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31 जुलाई 2018



नया हरियाणा

हरियाणा की राजनीति में आजकल इनेलो कांग्रेस वाली चाल चलती हुई साफ दिख रही है. जमीनी धरातल पर यह चाल भले ही साफ न दिखती हो पर सोशल मीडिया पर इस चाल को साफ देखा पढ़ा जा सकता है. हरियाणा में कांग्रेस बाहर से धड़ों में बंटी हुई दिखती है, पर कांग्रेस की मजबूती का आधार भी ये धड़ेबाजी ही है. हुड्डा, तंवर, कुलदीप, किरण, सुरजेवाला और शैलजा आदि के सीएम प्रोजैक्ट करके वो हर क्षेत्र में कांग्रेस को मजबूत बना लेती है.
ठीक इसी तर्ज पर इस बार इनेलो ने एक दल नेक दल के बजाय अपनी रणनीति बदलते हुए अभय गुट और दुष्यंत गुट के रूप में मोडरेट किया है. ताकि पार्टी के भीतर एक-दूसरे को पसंद न करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए विकल्प खुला रहे. अलग-अलग गुट नहीं होने के कारण इनेलो के ऐसे वर्कर अंत में इनेलो की ही गोभी खोदने का काम करते थे. इन गोभी खोद कार्यकर्ताओं के लिए इनेलो ने हो सकता है ये रणनीति बनाई हो. दूसरी तरफ इसका फायदा ये भी इनेलो को मिलेगा कि कांग्रेस और भाजपा उसे कमजोर समझने की भूल कर सकती है. बाहर लड़ाई जाहिर करो और पार्टी को भीतर से भी मजबूत करो. 
अगर इनेलो ने यह रणनीति बनाई है तो जाहिर है इसका फायदा पार्टी को ही मिलेगा. ठीक उसी तरह जैसे कांग्रेस को ओवरआल गुटबाजी का फायदा ही मिलता है. क्योंकि वोटर और कार्यकर्ता वोट तो पार्टी के निशान पर ही डालेंगे. इस एंगल से देखा जाए तो इनेलो पार्टी को जो भीतरी वोटरों के दगा देने से नुकसान होता था, उसकी जस्टीफाई करने के लिए यह संतुलित रणनीति कही जा सकती है. यह भी सच्चाई है कि एक नेता से रूठे हुए कार्यर्ताओं को कोई ठोर तो चाहिए ही. अभय चौटाला से रूष्ट हुए कार्यकर्ताओं के लिए दुष्यंत चौटाला ठोर है और दुष्यंत से रूष्ट कार्यकर्ताओं के लिए अभय सिंह चौटाला ठोर हैं. इस तरह कुल मिलाकर फायदा इनेलो को ही मिलेगा.
अब वो वोट देवीलाल के नाम पर मिले, ओमप्रकाश चौटाला के नाम पर मिले, अजय चौटाला के नाम पर मिले, अभय चौटाला के नाम पर मिले, दुष्यंत चौटाला, दिग्विजय चौटाला, करण चौटाला, अर्जुन चौटाला के नाम पर मिले. फायदा चश्मे को ही होना है, क्योंकि वोट तो चश्मे पर ही पड़ेंगी. तब ये सारे नाम चश्में में अट जाएंगे.
इनेलो की अगर यह रणनीति है तो यह रणनीति पार्टी को फायदा ही देगी. वरना भीतरी लड़ाई पार्टी का नुकसान ही करेगी. क्योंकि ऐसी स्थिति में नेता एक-दूसरे को हरवाने के लिए अलग-अलग पैंतरों का इस्तेमाल करेंगे.


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