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नया हरियाणा

सोमवार , 20 अगस्त 2018

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हरियाणा की शान हैं सोशल एक्टिविस्ट प्रमिता चौधरी

उन्होंने मुसीबतों के सामने झुकना नहीं सीखा, बल्कि लड़कर जीतना सीखा है.

Social activist Primaeta Chaudhary, naya haryana, नया हरियाणा

31 जुलाई 2018

संजू सैनी

14 साल की उम्र में शादी और 15 साल की उम्र में मां बन गयी. लेकिन हौंसलों को कभी टूटने नहीं दिया और ना ही खुद को कभी कमजोर पड़ने दिया. कमजोरियों को अपनी ताकत में बदलना उसने अपनी जिदों से सीखा था. वो उलहाने देने में नहीं बल्कि हालात बदलने में यकीन करती है और उस बदलाव को पहले अपने भीतर मजबूती प्रदान करती है. फिर उसे हकीकत में बदलती है. वो राजकुमारों के सपने देखने वाली आम लड़की नहीं है. बल्कि अपने साथ दूसरों के दुःख-दर्द को दूर करने में यकीन करने वाली लड़की है.
उसने समाज को बाल विवाह बाबत कोसा नहीं. ना ही अपनी फूटी तकदीर सोचकर खुद को सीमित होने दिया. बस मन ही मन ये सोच लिया कि जो अत्याचार मेरे साथ  हुआ है, वो किसी ओर के साथ ना हो. इसी दिशा में वो लगातार आगे बढ़ रही हैं. 
जी हां, आज आपसे रूबरू करवा रहे हैं एक ऐसी ही आत्मनिर्भर और दृढ़ निश्चय वाली फरीदाबाद की रहने वाली  प्रमिता चौधरी से. जो मुझे मिली एक बीमार 17 साल की बच्ची की निसंकोच सहायता करते हुए सफ़रदर जंग होस्पिटल में. जहां उस बच्ची को खून में इंफेक्शन था और हर रोज पांच से छः युनिट्स खून की जरूरत पड़ती है। वरना बच्ची की जान को खतरा है। ऐसे हालात में बच्ची की जान बचाकर उन्होंने एक सच्चे रब्ब के सिपाही का काम किया है।। 
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका दिल इतना बड़ा होता है कि खुद के साथ कुछ भी हुआ हो लेकिन उनसे अच्छाई नहीं छूट सकती, वही बदलाव का कारण बनते हैं। क्योंकि वो हालात के आगे विवश नहीं होते।
उसने बाल विवाह के विरूद्ध समाज में मुहिम चलाई ताकि कोई दूसरी बच्ची बाल विवाह का शिकार न हो। समाज उस समय बाल विवाह में विश्वास करता था इसी कारण इनके पिता ने भी समाज के गलत रीति रिवाज को मानना ठीक समझा। लेकिन वो अपनी बेटी को कभी मजबूर या कमजोर नहीं देखना चाहते थे इसलिए उन्होंने प्रमिता को अपनी पढ़ाई निरन्तर करने की सलाह दी। तब वो महज आठवीं कक्षा पास करके नौवीं कक्षा में पढ़ रही थीं। अपनी पढ़ाई पूरी की और आगे बढ़कर एक अध्यापिका का पेशा अपनाया लेकिन इतना ही नहीं।
प्रमिता को हर समय समाज की फ़िक्र लगी रहती थी। अपने माता-पिता व समाज की बुराइयों को खुद झेल चुकी थी उसे सही में बदलाव करना था। समझ नहीं आया कहां से शुरू करे। बस आपको पता है ना शुरू करने वाले रूकते नहीं वो बस कर जाते हैं। 
2003 से समाज में कोई भी बुराई नजर आई उन्होंने आवाज उठाई। महिला उत्पीडन हो या शराब तस्करी या अवैध खनन, या कोई इंसान बीमार हो या जानवर, जिसकी साहयता किसी ने नहीं कि वहां प्रमिता चौधरी खड़ी मिली। इक्का दुक्का पहल से शुरू होने वाले ये काम धीरे-धीरे आंदोलन बन गए। महिला शक्ति की मिसाल बन चुकी प्रमिता चौधरी जब किसी घायल को उठाकर अस्पताल पहुंचाती तो एक दो ऐसे हादसे भी हुए की घायल का बचना मुश्किल रहा।
उन्हें बहुत बार सुनने को मिलता की एक ही बेटा था। अब बुढ़े मां-बाप की देख रेख करने वाला कोई नहीं रहा। अब घर में कमाने वाला कोई नहीं रहा। ये बात उनके मन में घर कर गयी और सोचने लगी उन बुढ़े मां-बाप के बारे में। जिनके बच्चे उनसे बिछड़ गए और जो बच्चों के बिना अब अनाथ हो गए थे। 
बस फिर क्या था हौंसला इतना कि जमीन पर पैर रखकर आसमान छू जाये और अपनी एक संस्कार फाउंडेशन बनाकर वृद्ध आश्रम का काम खुद के प्लाट में शुरू कर दिया। जो बुढ़ापे की लाठी बनेगा उन मां-बाप की जो बेसहारा हो गए हैं। मेरा सलाम है ऐसी महिला शक्ति को जिनसे मेरा समाज आज भी सुसज्जित है।
 


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