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शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

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मॉब लिंचिंग : लोकतंत्र में भीड़तंत्र

लिंचिंग की घटनाओं में एक तरफा किसी एक धर्म पर टिका टिप्पणी करने से बचिये

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31 जुलाई 2018

मेनका चौधरी

जिस भी देश में लोकतंत्र रहा है, वहाँ मैजोरिटी का माइनॉरिटी पर दबदबा रहा है,चाहे यूरोप हो एशिया हो.. या अमेरिका

आजकल,मॉब लिंचिंग हम सुनते हैं भारत में,मॉब लिंचिंग मने भीड़ द्वारा किसी एक या एक से ज़्यादा व्यक्ति को मार पीट कर ज़ख्मी कर देना या जान ले लेना, और वजह इसकी निजी से लेकर धार्मिक या राजनीतिक कुछ भी हो सकती है, चूंकि कोई भी कोर्ट या कानून भीड़ को सज़ा नही दे सकता तो अपराध करने का यह बेहद सरल और अच्छा तरीका है आपराधिक या कट्टर मानसिकता के समूह के लिये।

इतिहास देखें तो लिंचिंग की शुरुवात होती है 1882 में अमेरिका में जो लगभग 1968 तक चलती है जिसमें तकरीबन 4743 लिंचिंग केस दर्ज होते हैं,जिनमें से 3446 अश्वेत लिंच पाए जाते हैं,मतलब टोटल लिंचिंग केस के 72.7 प्रतिशत अश्वेत ही थे..और माना यह भी जाता है कि यह आंकड़ा भी सही नही है क्योंकि सारे केस रिकॉर्ड हुए ही नही,4743 में 1297 केस श्वेत अमेरिकन्स के दर्ज हुए और यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि ये श्वेत लिंच हुए क्योंकि इन्होंने अश्वेतों के साथ हो रही लिंचिंग का विरोध किया,उन्हें बचाने की कोशिश की।

भारत में शायद अगर मैं गलत नही हूँ पहला केस दादरी का हुआ 2015 में ,जब मोहम्मद इख़लाक़ नामक शख़्स को कत्ल कर दिया भीड़ ने इस शक पर की उसके घर पर गऊ मांस है।उसके बाद कई केसेस हुए,जिसमें हिंदू भी लिंच हुए,मुस्लिम भी और दलित भी,अब सवाल यह है कि कैसे भीड़ इस तरह उन्मादी हो जाती है कि किसी की जान लेने से भी संकोच नही करती?

कारण समझने अमेरिका का ही उदाहरण लेना होगा,वहाँ भी मैजोरिटी श्वेतों ने माइनॉरिटी अश्वेतों को लिंच किया रंगभेद के चलते,जैसे आज भारत में माइनॉरिटी के साथ हो रहा है.. उस समय अमेरिकन्स के दिमाग में बिठा दिया गया था कि यह अश्वेत काली चमड़ी वाले आपका हक मार रहे हैं,आबादी बढ़ा रहे हैं..आपके देश पर कब्जा जमाए हुए हैं और इसके पीछे कारण था वर्ल्ड वार से उपजी बेरोजगारी,हिली हुई अर्थ व्यवस्था और सरकार के खिलाफ जनता का रोष जिसे सरकारें पॉलिटिकल लीडर्स भांप चुके थे,उन्हें समझ आ गया था कि ज़रूरी मुद्दों पर जनता गिरेबान पकड़े उससे पहले इन्हें बाँटो आपस में लड़वाओ,और उसके लिये सबसे उपयुक्त था धर्म/रंग ,चूंकि धर्म के नाम पर मैजोरिटी को माइनॉरिटी के खिलाफ आसानी से भड़काया जा सकता था, और यही हुआ भी।

यह तब हुआ जब सोशल मीडिया नाम की चिड़िया जन्मी नही थी, और आज सोशल मीडिया की ताकत सब जानते ही हैं,इसी सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर फेसबुक/व्हाट्सएप और तमाम एप के ज़रिए अफवाह को फैलाया जाता है (ज़ुकरबर्ग ने सोचा भी नही होगा कि आपसी रिश्ते बनाने और दोस्ती यारी बढ़ाने को बनाया फेसबुक किस तरह झगड़ो को दंगो को बढ़ावा देगा) और भीड़ को उन्मादी बनाया जाता है, लेकिन पीछे कारण सिर्फ और सिर्फ एक ही रहता है कि,सरकार से ज़रूरी मुद्दों पर सवाल ना होनें पाएं किसी भी कीमत पर, बेरोजगार नौजवान को भटकाना आसान है सरकारों के लिये,जिसे वह बखूबी अंजाम देतीं हैं।

यहाँ यह भी साफ कर दूँ कि यह सिर्फ भाजपा ही करती है ऐसा नही है, यह हर सरकार का अंतिम हथियार है, मैजोरिटी को उसका धर्म संकट में दिखा कर उलझाना या आपसी रंजिशें पैदा करवाना,हाँ यह ज़रूर है कि इस सरकार में शायद यह ज़्यादा हो रहा हो लेकिन जब जब सवाल किसी भी सरकार से किये जाएंगे, इस तरह की उन्माद से ओत प्रोत भीड़ आपके दरवाज़े पर मिलेगी।

गाय बहाना मात्र है,इसके पीछे की मनोदशा समझनी होगी,बेरोजगारी/गरीबी/महंगाई जो कुंठा को बढ़ा रही है,उसमें नाकाम सरकारी नीतियां आग में घी का काम कर रहीं हैं, और उसपर धर्म की अफीम कुछ सोचने समझने का मौका ही नही देती, मंझे हुए राजनीतिक वक्ता अपनी सभाओं से यह यकीन दिला देते हैं कि फलां धर्म खतरे में है और फलां धर्म की वजह से है, और इसके बाद गाय केवल बहाना बन के रह जाती है इस कुंठित फ्रस्ट्रेटेड भीड़ के लिये अपनी गरीबी लाचारी की भड़ास निकालने किसी कमज़ोर पर।

लिंचिंग की घटनाओं में एक तरफा किसी एक धर्म पर टिका टिप्पणी करने से बचिये, क्योंकि यह प्रायोजित घटनाएं ही होती हैं अक्सर.. खुले दिमाग से मूल कारणों को समझने की आव्यशकता है, और सबसे ज़रूरी बात मुद्दों से भटकना नही है, जो यह सरकारें और इनकी खरीदी हुई मीडिया चाहती हैं!!

नोट :- फोटो है usa circa 1920,श्वेतों का समूह एक अश्वेत को लिंच करता हुआ!

 

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