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नया हरियाणा

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2018

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मनोरंजन : शोले एक दलित कथा

राजनीतिक विमर्श के साथ-साथ भरपूर मनोरंजन है इस पूर्नरचना में.

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27 जुलाई 2018

नया हरियाणा

उत्तर-आधुनिक दौर में साहित्य के साथ-साथ फिल्मों के नए-नए अर्थ निकाले जाने लगे हैं. साथ में विमर्शों का रूप भी दिया जाने लगा है. पेश है ऐसी रचनात्मक हरकत-

एक बार रमेश सिप्पी नाम का एक मनुवादी फिल्मकार ट्रैन में सफर कर रहा था. ट्रैन में उसे एक दलित बच्चा मिला जो लोगों को कहानियां सुनाकर पैसे कमाता था. उसकी एक कहानी 'गौरवशाली दलित' सुनकर मनुवादी सिप्पी इतना प्रभावित हुआ कि उस कहानी पर फ़िल्म बनाने की ठान ली. लेकिन चूंकि सिप्पी मनुवादी था इसलिए उसने उस दलित बच्चे की कहानी का नाम बदलकर 'शोले' कर दिया. लेकिन मैं आज आपको बताउंगी 'गौरवशाली दलित' की कहानी के बारे में; कि किस तरह 1975 से अब तक (43 साल) इन मनुवादियों ने हमें सच से दूर रखा।

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"शोले : एक दलित कथा"

कहानी है एक ब्राह्मण गब्बर सिंह पांडेय से दलित बलदेव महतो (जिसे प्यार से लोग ठाकुर साब कहते थे) के इंतकाम की, जिसमें उसका साथ देते हैं शहर के दो बहादुर मीणा बॉयज... जय मीणा और वीरू मीणा।

भीमगढ़ नामक गाँव में दलित बलदेव महतो रहता था। पेशे से नाई था इसलिए लोग उसे ठाकुर साब भी कहते थे. पास ही के गाँव में गब्बर सिंह पांडेय की हवेली थी। एक दिन नाई बलदेव जब उनकी दाढ़ी व बाल बनाने उनकी हवेली गया तो ज़रा सी चूक होने पर ब्राह्मण गब्बर ने दलित ठाकुर के दोनों हाथ काट दिए।साथ ही उसके पूरे दलित परिवार को भी मार डाला।

दलित बलदेव ने बदला लेने की सोची। उसने शहर जाकर दोनों मीणा बॉयज़ से संपर्क किया। उन्हें आरक्षण दिलवाकर भीमगढ़ स्टेशन पर टिकट कलेक्टर की नौकरी देने का वादा भी किया और गाँव बुला लिया। दोनों मीणा बॉयज इतने गरीब दलित थे कि पूरी फिल्म में एक जोड़ी कपडे ही पहने रहे। यहीं पर वीरू मीणा को बसंती मांझी नामक महादलित कन्या से प्रेम हो गया। बसंती जो दलित थी और 'धन्नेश्वरी हाथी' की पीलमान थी. और उसी को चला के अपना और अपनी मौसी का पेट पालती थी। वीरू मीणा बसंती मांझी के प्रेम में इस कदर दीवाना हुआ कि उसे पाने के लिए भीमरस पीकर टँकी पर चढ़ गया, तब बाबा आंबेडकर हाथ में डायरी लेकर प्रकट हुए और दोनों को एक कर दिया।

दूसरी ओर ठाकुर साब की विधवा बहु जो एक मुसहर थी.. मूस (चूहा) पकड़ के खाती थी. एक दिन मूस पकड़ते पकड़ते उसकी नजर जय मीणा से टकरा गई और दोनों के बीच 'जै भीम' हो गया।

उधर गब्बर के घर एक दलित नौकर था कालिया पासवान। एक दिन वो जब गाँव भीमगढ़ के स्टेशन पर अपने दोस्त का टिकट 'रिजर्वेशन' करवाने गया तो गाँव वालों ने उसे भगा दिया. वो भागते हुए हवेली पहुंचा।

हवेली पहुंचने पर गब्बर पांडेय ने उससे पूछा : कितनी आरक्षित सीट थी वहाँ?
कालिया पासवान : पंडीजी दो।
गब्बर पांडेय : वो दो दलित थे और तुम छः .. फिर भी रिजर्वेशन न ले सके poor के बच्चों।

गब्बर का एक दोस्त था, पंडित सांभा पांडेय जो पत्रा (पंचांग) देख के होली वगैरह का त्यौहार बताता था कि होली कब है। उसी कपटी ब्राह्मण साम्भा पाण्डेय ने गब्बर सिंह के कान भर दिए दलित कालिया के खिलाफ और गब्बर पांडेय ने दलित कालिया पासवान को कोहड़ा पूरी खिलाकर मार डाला।

जब जय और वीरू दोनो मीणा बॉयज़ का सामना गब्बर और उसके सवर्ण साथियों से हुआ तो सवर्णों के पास बन्दूक थी। मीणा बॉयज डरे नहीं, उन्होंने बन्दूक उठाने की बजाए अपने पर्स से बाबा साहेब की तस्वीर निकाली और सामने रख दी। तस्वीर से एक दिव्य ज्योति निकली, सवर्णों की आँखे चुंधिया गयी, वो तड़पने लगे और डर कर , रोते बिलखते गाँव से भाग गए।

गब्बर पांडेय की एक दलित माशूका थी हेलेन देवी. हेलेन देवी की उम्र ढलती जा रही थी अब गब्बर को उससे प्यार करने में मज़ा नहीं आता था। 

इसलिए एक दिन उसने वीरू की गर्लफ्रेंड बसंती को अपनी हवेली पर उठवा लिया. और वीरू जब अपनी गर्लफ्रेंड को छुड़वाने के लिए गब्बर पांडेय की हवेली पर पहुंचा तो उसे एक खम्बे में बांध के बसन्ती को डांस करने के लिए कहा, लेकिन बहादुर मीणा बॉय वीरू ने जै भीम का नारा लगाते हुए कहा- "बसंती इन सवर्ण ब्राह्मणों के सामने मत नाचना"

तभी जय वहाँ आ जाता है। दोनों तरफ से गोलीबारी होती है। सवर्ण दलित पर भारी पड़ने लगते हैं कि तभी नीले आसमान से नीला कोट पहने हाथ में डायरी लिए बाबा आंबेडकर प्रकट होते हैं और सवर्णों पर अग्निवर्षा कर गब्बर पांडेय व उसके साथियों को भस्म कर देते हैं।

जय और वीरू दोनो मीणा बॉयज की शादियां हो जाती है. दोनों को आरक्षण के तहत टीटी की नौकरी मिल जाती है. अम्बेडकर जी की शक्ति से बलदेव महतो के दोनों हाथ उग आते हैं. और फिर.... कहानी समाप्त !!


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